सितंबर 11, 2015

गुप्ता जी की याद..

इधर सोचने बहुत लगा हूँ। पुराने दिनों पर घंटों सोचते हुए हफ़्तों बिता सकता हूँ। इतने दिन बिता देने की यह काबिलियत मुझमें अचानक घर नहीं कर गयी। यह मेरे ख़ून में है। क्योंकि मेरे ख़ून में इस मिट्टी की हवा नहीं है। पानी भी नहीं है। कुछ भी नहीं है। जिन-जिन के ख़ून में यहाँ की हवा नहीं होगी, वह बिलकुल मेरी तरह किसी खाली कमरे में बैठे कभी-भी गुम हो सकते हैं। हम भले इस शहर में पले-बड़े लेकिन इसकी आपाधापी से बचने के हुनर जबतक सीखते, यह शहर अपनी शक्ल बदल लेता। शक्ल बदलना इसकी पुरानी आदत है। पर जिस जगह हम रहते हैं, वह अभी भी मेरे बचपन के दिनों को समेटे हुए बिलकुल वैसी ही है। कोई पत्ता इधर से उधर नहीं हुआ, इमारत की ईंट तो बहुत दूर की बात है। ऐसे ही गुप्ताजी हमारे बचपन में लौटा ले जाने वाली खिड़की हैं।

यह आख़िरी पंक्ति हमारे बड़े होते दिनों की अलिखित भूमिका है। यह वही नक्शा है, जिसपर लिखा था, आने वाले दिनों में हम दोनों भाइयों को कैसे होते जाना है। कहीं-न-कहीं हम उन दिनों के खालीपन को अपने अंदर महसूस करते खो जाते हैं। पर पता नहीं क्यों कभी-कभी लगता है, जैसे शायद असल ज़िन्दगी में वह दौर कभी रहा ही नहीं होगा। हम बस उसे अपने अंदर ही गढ़ते रहें होंगे जैसे। जैसे वह खुली आँखों से देखा एक अधूरा कोमल सपना होगा, जिसमें नींद टूट जाने पर आँख मलते हमें स्कूल जाने में देर हो रही होगी। जैसे मम्मी कह रही हों, अब उठ जाओ। नाश्ता बन गया है। स्कूल बस भी अभी आती होगी। हर सोमवार इस स्कूल बस के आने से काफ़ी पहले इतवार भी आया करते, जब हमारे घर गुप्ताजी आने की सोचा करते। जैसे उनके आते पर ही हमारे रुके हुए इतवार आ जाया करते।

सच यह हमारे बचपन के वह साल थे, जब हम सड़कों पर इस दिन को अपने अंदर उतरता हुआ महसूस करते। ढलती हुई शाम लेम्पोस्ट से आती पीली छाया में ख़ुद को ढूँढ़ते। थोड़ा-सा ख़ुद को छिपाते। सच तब दिल्ली थोड़ी-सी तब चश्मे बद्दूर जैसी रही होगी, थोड़ी चित्तचोर के आमोल पालेकर जैसी। उनके गाने, आज से पहले आज से जादा खुशी, आजतक नहीं मिली। सुनकर देखिये, उस वक़्त में वापस न लौट जाएँ तो कहिए। हम भी उनकी याद में बार-बार लौट जाते। वह आयेंगे अपनी ख़ूब सारी बातों के साथ। यादों के पुलिंदों को कंधों पर उठाए। पहली बार हमने ध्यान से सुनना तभी शुरू किया। तब से लेकर कितने साल लगातार उन्हे सुनते रहे, बिन रुके। बिन थके।

रात में खाना खाकर वह मर्फी का रेडियो और फ़ोल्डिंग चारपाई लेकर छत पर निकल आते। वहीं नींद आने तक वे विविध भारती सुनते। तभी सुनना शायद वह एक इस बाजे का ही पसंद करते रहे होंगे। यह कल जो मैं पापा के साथ फीलिप्स का थ्री इन वन रेडियो लेता आया हूँ, वह मेरे अंदर उन दिनों की किसी बची हुई याद का बचा रह गया कोई कतरा होगा। वह शायद सीलमपुर जाने वाली दो सौ पंद्रह दो, सौ सोलह नंबर की बस के इंतज़ार में बिरला मंदिर वाले स्टैंड पर चले जाते। कभी वहाँ बस टर्मिनल हुआ करता था। उन्हे सीमा पुरी नहीं जाना होता, वह उससे काफ़ी पहले ही लाल किले पर उतरकर लाजपत राय मार्केट होते हुए भागीरथ प्लेस की अपनी अजानी-सी दुकान पर पहुँच जाते। मेरे पास उस इतवार शाम की बहुत ही धुँधली-सी याद है, जब हम लोग भी कभी शास्त्री पार्क वाले इनके किराये के मकान पर गए होंगे। मीरा चाची आई हुई थीं तब। तब मम्मी का पैर ठीक था। उसमें न सूजन थी, न इस तरह दर्द हुआ करता था। रात अँधेरे में वह गलियाँ कुछ ख़ास याद नहीं, पर लौटते हुए उस दीवार पर काली सफ़ेद पट्टियाँ ज़रूर अभी भी कभी धुँधली धुँधली-सी नज़र आती हैं।

मम्मी तब भी बड़ी मुश्किल से उन ऊँची दीवारों को लाँघ पाईं थी, इसका कारण बहुत दिनों बाद तब जान पाया, जब हमने मिशेल फूको की किताब में 'पॉलिटिक्स ऑफ़ बॉडी' को पढ़ा। तब फ़िर पता चला, सिर्फ़ पढ़ने से इस दुनिया का कुछ भी नहीं होने वाला।

{अनकही कहानी के अधूरे मुक़ाम से..}

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