सितंबर 27, 2015

लिखना

कभी-कभी सोचता हूँ, जिस तरह ख़ुद को बेतरतीब लगने की कोशिश हम सब कभी-न-कभी अपने अंदर करते रहते हैं, उनका सीधा साधा कोई मतलब नहीं निकलता। यह बिलकुल वैसी ही बात है जैसे लिखने का ख़ूब मन हो और तभी प्यास लग जाये। पानी की बोतल कमरे में दूर रखी है। इसलिए उठना पड़ेगा। पर यकायक पानी के गिलास के साथ हम खिड़की के बाहर देखने लग जाते हैं। सामने वाली छत पर एक लड़की ढलती रूमानी शाम के इस पल टहलते हुए अपने बाल संवारते हुए इस तरफ़ नहीं देखती। क्योंकि उसे पता है,  हम उस तरफ़ देख रहे हैं। इस तरह हम सब भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि वापस मेज़ पर लौटकर कुछ लिखने के ख़याल से भरे हुए क्षणों में हम कभी लौट नहीं पाएंगे।

यह सच है,लिखना अपने आप में असामान्य घटना है किन्तु इस तरह होने के बावजूद यह अपने पीछे छूट गयी निशानियों में कितने सिलसिलेवार तरीके से कई ढर्रों के होने की बात कह जाती है। मेरी डायरियों में कहीं कोई पन्ना नहीं छूटता। एक के नीचे एक बातें तारीखवार आती रही हैं। यहाँ तक के उस वक़्त को भी वहाँ लिखता रहा हूँ। बस पिछले साल की बात है उन अधूरे पन्नों को अलमारी में बंद कर आया। फ़िर जून में इतने दोहरावों में बकाया पन्ने ख़त्म नहीं हुए तो कुछ छोड़ आया। इसके अलावे न जाने कितनी कतरनों पर कुछ-कुछ लिखकर इधर उधर किताबों में संभाले रखा है।

कल बड़े दिनों बाद लाइब्ररी गया तो दोबारामोहन राकेश की डायरी अपनी तरफ़ खींचने लगी। पर नहीं लाया। मलयज अपने हिस्से की बातों को लिखने के लिए कविताओं का सहारा क्यों लेते हैं पता नहीं। इसलिए उन्हे लाने का मन नहीं हुआ। कविता एक तरह का आत्मालाप है। किसी और के लिए होने से पहले ख़ुद के लिए कहा गया वक्तव्य है। पता नहीं इधर ऐसा क्यों हुआ कि इस विधा को अपने अंदर सबसे जादा महसूस करने लगा हूँ। इसमें ईमानदारी न हो तो सब लिखा हुआ बर्बाद है। ऐसा नहीं है, यह विधा अपने आप में किसी तरह की बेईमानी का निषेध करती है। हम मिलावटें भी देख लेते हैं। कहाँ सिवाने उधेड़ने से बचा ली गयी हैं। कहाँ और उघाड़ सकते थे। यह हम सबके साथ होता है। सिर्फ़ मन्नू भण्डारी, लीलाधर मण्डलोई, रमेशचंद्र शाह या कृष्ण बलदेव वैध के साथ ऐसा नहीं हुआ है। न लिखकर वह बहुत सारी बातें टूटने से बचा ले जाते हैं। जैसे जितना मेरा सच है, उससे कहीं जादा छिपा ले जाता हूँ। उसे न कहने से उस घटना या व्यक्तित्व के समझने के दिये गए सूत्रों को छोड़ देता हूँ। न कहकर भी सब कह देने का हुनर आते-आते आता है। इतना आसान नहीं है।

लिखने न लिखने के बीच बहुत सारी ऐसी जगहें हैं, जहाँ कई सवाल मिलते हैं। सबके जवाब किसी के पास नहीं होते। सब अपनी सहूलियतों से उनको कहते छोड़ते रहते हैं। हम सामने कहने से बच रहे हैं तो मतलब यह नहीं कि मन में कुछ नहीं चल रहा। मन अपने अवचेतन में वह दर्ज़ करता चलता है। कहाँ किस चीज़ पर बोल देना था, पर नहीं कहना, उन सम्बन्धों को आगे के कई सालों के लिए बचा ले जाना है। इस ज़िंदगी में ऐसे कई छोटे-छोटे दौर आते हैं, जब हम सबसे जादा अपनी बातों से लोगों को ख़ुद से दूर कर लेना चाहते हैं। हमें पता रहता है, वह पूरी शिद्दत से सामने मौजूद नहीं है, फ़िर भी हम जाने देते हैं। जैसे हफ़्तों बाद किसी दोस्त को फोन करो और घंटी बजने पर भी वह उधर से कोई जवाब नहीं देता। अगर गलती से उठा भी ले तब यह कहकर जल्दी से रख देता है, अभी थोड़ी देर बाद करता हूँ। और दूसरी तरफ़ हमारे हिस्से सिर्फ़ इंतज़ार आता हैं। लिखना भी इन दोस्तियों की तरह है। हम ख़ुद से मोलभाव करते हैं। मन के किन्ही हिस्सों को भूल जाने के लिए उन्हे सबसे जादा लिखते हैं। जिन्हे याद नहीं करना चाहते उन्हे किसी बहाने से पन्नों में दबाकर रख देते हैं। यह चालाकियाँ न हों तो जीना मुश्किल हो जाएँ। यह खाली कमरे की दीवारों से सिर टकराने की तरह है, जहाँ ऐसा करते हुए हमें कोई नहीं देख रहा।

यह किसी कैमरे से तस्वीर खींचने की तरह आसान नहीं है। लगातार ख़ुद को सही गलत जगहों पर फ़्रेम करते रहना है। शब्द जितने पास से गुज़रेंगे उतने ही दिल में अंदर धँसते जाएँगे। भले वह किसी को समझ आए या न आयें, हम उनसे नहीं बच सकते। यह उस लंबी सैर की तरह है, जहाँ हर पत्थर हमारा पहचाना हुआ है। उन आवाज़ों में अपनी आवाज़ को बिन सुने चीन्ह लेने की तरह। याद मेरे लिए कोई ओट नहीं है जिसके पीछे हम छिप जाते हैं। बड़ा अजीब लगता है, जब वह कहते हैं के हमें जब अपना भविष्य नजर नहीं आता, तब हम अपना भूत देखने लगते हैं। उन्हे शायद नहीं पता, यादें हमारे लिए आने वाले कल के सुनहरे सपने हैं। मैं उस खिड़की से सिर्फ़ एक मर्तबा उसे देखता हूँ, जो किसी की पत्नी है। सच, यहाँ मुझे तुम याद हो आती हो। तुम अभी पास नहीं हो। आने वाली हो। इस ख़याल को ऊपर से नीचे आते हुए दोबारा लिखने को मनोविश्लेषक किस तरह लेंगे, पता नहीं। पर यह ज़रूर है,लिखना इसी तरह मेरे लिए बहाना है। अगर मैं पेड़ देखकर लिख रहा हूँ, तो वह मेरे लिए किसी याद में जाने लायक सड़क भी है और वहीं थोड़ी देर बैठे रहने के लिए बन गयी कुर्सी भी।

1 टिप्पणी:

  1. अगर मैं पेड़ देखकर लिख रहा हूँ, तो वह मेरे लिए किसी याद में जाने लायक सड़क भी है और वहीं थोड़ी देर बैठे रहने के लिए बन गयी कुर्सी भी।

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