सितंबर 12, 2015

कल रात

कल रात इस ख़याल के दिल में उतरते जाने की देर थी कि नींद फ़िर लौट के नहीं आई। उस दृश्य को अपने सामने घटित होते देखता हूँ तो रौंगटे खड़े हो जाते हैं। रात ऐसे ही कई बार गिरफ़्त में ले लेती है। फ़िर छोड़े नहीं छोड़ती। गुप्ता जी वहीं कहीं सड़क किनारे ख़ून से लथपथ पड़े रह गए होंगे। कोई उनके पास नहीं आया होगा। सब जो पास से गुजरे होंगे, गुज़र गए होंगे। अगर वक़्त रहते वह जिला अस्पताल पहुँच जाते तो वह आज भी होते। वह हमारी याद का हिस्सा तबसे हैं, जब हम बोलना सीख रहे थे। जब कुछ बोलने-सुनने लायक हुए वह चले गए। हम सबकी ज़िंदगियाँ ऐसी ही किसी बात याद के आसपास खुद को बुनती रही हैं। उनका पूरा नाम भले जयप्रकाश गुप्ता रहा हो हमारे लिए वह गुप्ता जी ही थे। उनकी ज़िंदगी इस दुनिया में हमारी तरह एक मामूली ज़िंदगी बनकर रह गयी।

कभी सोचता हूँ, उसी भागीरथ प्लेस मार्केट में उनकी एक तस्वीर लेकर जाऊँगा। लोगों को दिखा दिखाकर पूछूंगा। कोई जानता है इन्हे? कौन हैं यह? यह हमारे गुप्ता जी हैं। यहीं किसी जमाने में काम किया करते थे। इस तरह पूछ पूछकर अपनी ज़िंदगी की सबसे पहली डॉक्युमेंट्री फ़िल्म बनाऊँगा। देखुंगा, लोग मरकर भी कैसे सबके दिलों में ज़िंदा रहते हैं। वह भी कहीं न कहीं ज़िंदा होंगे। ज़रूर होंगे।

ऐसे ही कितने ख़याल मेरे दिल में, मेरे मन में लगातार चलते रहते हैं। जब नहीं लिख रहा होता, तब लगता है, कोई मेरे अंदर धीमे-धीमे बोल रहा है। उन सारी बातों को सुनने की कोशिश करते-करते थक जाता हूँ। थककर उन बातों को याद करने की कोशिश में लगता है, जैसे इन बातें ने धीरे-धीरे मेरे इर्दगिर्द किसी महीन मकड़ी की तरह अनदेखा जाला बुनकर अपने शिकार को घेर लिया हो। कभी-कभी लगता है मेरा दिमाग अपनी क्षमता से अधिक ऊर्जा की खपत कर रहा है। वह भी शाम ढलते-ढलते कमरे में आकर इस खिड़की के बाहर की दुनिया को अपने अंदर समेटने की कोशिश करने लग जाता है। मन कहीं एक जगह टिक कर नहीं बैठता। उसकी आदत हो गयी है बेतरह घूमते रहने की। उमर जैसे-जैसे बढ़ रही है, वह हमें आवारा बदहवास बनाती जा रही है। उसे शायद यही करना आता है। उसकी यही आदत है।

छोटी-छोटी बातों पर दिल बैठने लग जाता है। लगता है जैसे इस दुनिया में कुछ ऐसा नहीं जो अपने असल शक्ल में बचा रह पाया हो। पिछले साल की बात है। अप्रैल की। हमारी तरफ़ शादी के जब दुल्हन चार-पाँच दिन ससुराल रहकर अपने पीहर जाती है, उसी फुरसत में लड़का-लड़की दोनों अपने-अपने ननिअउर हो आते हैं। इस रसम को ‘ननिअउर गोंजना’ कहते हैं। पर मैं कहाँ जाता? कहीं जाने के लिए कोई जगह बची नहीं रह गयी। बहुत पहले मामा, फ़िर नाना और नानी। कोई नहीं बचा। एक मामा हैं, वह आधा घर बेचकर कहीं कमा रहे हैं। इस बात को वहीं दिल में दबाकर रख दिला। कुछ नहीं कहा। बचपन का वह नानी घर  इस बड़ी-सी दुनिया में कहीं गुम हो गया।

ऐसी कितनी अनगिन बातें हैं, जो इस बहुत गहरी अँधेरी रात की तरह गाढ़ी होकर मुझे चारों तरफ़ से घेरे रहती हैं। जिन्हे लिखते वक़्त दिल में कहीं खो देने के बाद कुछ बचा नहीं रहता। सुबह के साढ़े तीन बजने वाले हैं, नींद अभी भी गायब है। थोड़ी देर के लिए बाहर गया, लगा जैसे मौसम में थोड़ी ठंडक है। चाँद आसमान में गुम होकर कहीं खो गया है। कोई रौशनी नहीं है। ट्यूब पहले ही बंद कर दी। अंदर आया तो लैम्प की रौशनी में बैठे वही किस्से फ़िर ख़ुद को दोहराने लगे। कल इतवार है। वह बलरामपुर से अगर आए होते तो आज ज़रूर आते। यह जो सामने रेडियो पड़ा है, उसे पापा के साथ वहीं उनके चाँदनी चौक से खरीदकर लाया हूँ। पर पापा को इतनी रात में जगाकर बताया नहीं के अभी इसमें अपनी आवाज़ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते गुम हो गया हूँ। सब सो रहे हैं और अब मेरी आँखें दर्द करने लगी हैं। उनमें अँधेरे की कड़वाहट भर गयी है। पर सोचता हूँ, मेज़ की तस्वीर लगाकर सो जाऊँ। फ़िर थोड़ा छत पर घूम लूँगा, तो नींद आ जाएगी। सच में। आ जाएगी।

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