अक्तूबर 22, 2015

एक लड़के की डायरी

पता नहीं वह उस पल के पहले किन ख़यालों से भर गया होगा। यादें कभी अंदर बाहर हुई भी होंगी? बात इतनी पुरानी भी नहीं है। कभी-कभी तो लगता अभी कल ही की तो है। दोनों एक वक़्त पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर खड़े, अपने आगे आने वाले दिनों के खवाबों ख़यालों में अनदेखे कल के सपने बुना करते। बुनते-बुनते थक जाते। पर कभी उन लोहे के बेंचों पर नहीं बैठते। बैठना सपनों में कहीं ठहर जाना था। जैसे कुछ दिनों बाद दोनों अब रोज़ मिलने के बहानों से कहीं दूर जाने वाले थे। लड़का-लड़की का यह जीने-मरने वाला प्यार था। जिसमें दोनों का मन ‘कसमें वादे निभायेंगे हम’ वाला ड्यूट गाने को करता रहता। कभी शायद गाया भी होगा। मन में। चुपके से। बिन किसी को कहे। उन्होने कभी बताया नहीं।

एक तरफ़ दोनों थे। एक तरफ़ सब थे। सब कहते, वह कभी नहीं मिल पायेंगे। सब उन्हे उनसे कुछ जादा जानते थे। क्योंकि वह सब भी नहीं मिल पाये कभी। सब असल में डरे हुए लोगों का जमावड़ा थे। वह इस भीड़ में जीते और इसी भीड़ में मर जाया करते थे। हम सोचते, एक दिन आएगा जब लड़के की नौकरी लग जाएगी, तब देखेंगे। इस ‘हम’ में हमेशा ‘लड़के’ होते। हमारे पास उस वक़्त न नौकरी थी, न इस सवाल का कोई जवाब था। हम बस उन दिनों दोनों का साथ होना देखते रहे। हमें कुछ करना नहीं था, बस देखना था।  

क्योंकि हम लड़के हैं इसलिए दूसरे लड़कों को समझने में जादा दिक्कत नहीं आती। मुझे हमेशा लगता, लड़के चाहे जैसा भी सोचा करते हों, वह मूलतः ‘पुरुष’ होते हैं। वह घर में शादी की बात पर ऊपर से कुछ भी दिखाते रहें, अंदर से वह ख़ुद परिवार से हार जाना चाहते हैं। वह कभी उस लड़की को अपने साथ ज़िंदगी भर नहीं झेल सकते, जो उनके अतीत में बराबर की भागीदार रही हो। उनके मन में हमेशा ऐसी लड़की की छवि बनती रहती है, जिसे उन्होनें कभी नहीं देखा हो। देखना, सपनों में बनती छवि का टूट जाना है। फ़िर वह जो हमें अरसे से जानती है, उसके सपने भले आते रहें, पर मन कुछ और ही गढ़ता रहता है। मुझे नहीं पता कि लड़कियों के मन में यह प्रक्रिया किस प्रकार घटित होती होगी। लेकिन हमारे समाज की इस संरचना में, जहाँ अभी भी माता-पिता घर में शादियाँ तय करते हैं, वहाँ इससे इंकार नहीं किया जा सकता। यह इस ‘उपभोक्तावादी समय’ में हमेशा कुछ बेहतर की उम्मीद है। यह हमारे भीतर संवेदना का ‘स्थगन काल’ है। हम इस वक़्त को अपने चेतन-अवचेतन के भीतर बिना किसी प्रतिरोध, ‘आत्मसात्’ कर रहे हैं। यह हमारे लिए एक ‘सुविधा’ बनता जा रहा है।

जिस तरह यह शहर शैक्षिक संस्थानों के भीतर लड़के-लड़कियों के लिए एक वृहद परिधि का निर्माण करते हैं, वहाँ इसके संभावना सबसे अधिक है। जितनी सहजता से हम यहाँ आपस में मिलते हैं, दूसरी ऐसी कोई जगह नहीं है। इसके बावजूद हम सबके अंदर, कहीं गहरे यह बात गड़ी रहती है कि भले इस सामने वाली लड़की के साथ हम किसी भी तरह से पेश आयें, यह हमारे माता-पिता या घरवालों को रास नहीं आएगी। क्यों नहीं आएगी, इसके तार्किक आधार भी हमारे मन मस्तिष्क में बनते-बिगड़ते रहते हैं। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बिन्दु छूटा जा रहा है कि आख़िर इसमें शिक्षा की क्या भूमिका है। वह कुछ करने की हैसियत में है या हम उसे अभी देख भी नहीं रहे हैं।

ध्यान से देखने में हम पाते हैं कि शिक्षा इस पूरी प्रक्रिया में उन्ही सांस्कृतिक-सामाजिक मूल्यों का पुनुरुत्पादन बड़ी बारीकी से करने लगती है, जिनके विरुद्ध वह ख़ुद को स्थापित करना चाहती थी। वह करिने से समझाती है के सामने वाली लड़की हमारे जाति की नहीं है। उनके यहाँ रीति-रिवाज़ हमारे धर्म के मुताबिक नहीं हैं। उसकी सोच भले आधुनिक मूल्यों से संचालित हो पर घर में हमें कोई मोर्चा नहीं खोलना। हम चाहते हैं, वह उस घर को जैसे भी हो, संभाल ले। क्योंकि हम बचपन से उस घर को देखते आ रहे हैं, इसलिए हमारी इतनी दोस्त हमारी पत्नी नहीं बन पाती। यह आख़िरी पंक्ति भी बड़ी चालाकी से उन संघर्षों की भविष्य में बनने वाली पृष्ठभूमियों को सिरे से ख़ारिज कर देती है। इसमें क्या छिप गया है, उसे अधिक विचलित होने की ज़रूरत के बिना, ऊपर की बातों को साथ लेकर थोड़े धैर्य से देखते चलना हैं।

एक तरफ़ मैं अपनी दोस्त से शादी न करके, उसके अच्छे खासे जीवन को असहज एवं असुविधाजनक बनने की संभावना को सिरे से ख़ारिज कर देता हूँ। वहीं दूसरी तरफ़ अपनी आधुनिक, जुझारू, संवेदनशील छवि को हमेशा के लिए बचा ले जाता हूँ। यह इस छवि के पीछे मेरी अक्षमता को छिपा ले जाना है। जहाँ मेरा बचपन का घर मुझसे नहीं छूटता। जो मेरी स्मृतियों में आज भी वैसा का वैसा बना हुआ है। इसे मैं तुम्हारे लिए छोड़ तो दूँ, पर मन वहीं किसी कोने में अरझ कर रह जाएगा। फ़िर जब मैं तुमसे झगड़कर किसी बात को मानने के लिए कहूँगा, तुम्हारे मन में हमारे बीते दिनों की यादें एक तुलनात्मक अध्ययन खड़ा करने में तुम्हारी मदद करेंगी। फ़िर तुम्हें मेरे व्यक्तित्व में फाँक नज़र आएगी, जिसे आख़िर तक सामने नहीं लाना चाहता था। मैं भी सोचने लगूँगा जहाँ से हम चले थे, वहाँ मैं भी ऐसा नहीं था।

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