अक्तूबर 07, 2015

अनमने से ख़याल..

कभी-कभी सोचता हूँ, हम भाग कर शादी कर लेते तो क्या होता? मेरे पास आज तक नौकरी नहीं है। इन दोनों बातों में प्रश्न-उत्तर वाला संबंध नहीं है, फ़िर भी दोनों एक-दूसरे का जवाब हैं। यह दोनों बातें आपस में ऐसे गुथी हुई हैं, जैसे तुम्हारी कल शाम वाली बँधी चोटियाँ। उनमें गुथे हुए फूलों की ख़ुशबू में खो जाने की हैसियत जुटाते-जुटाते मेरे गुम होते जाने की कहानी शुरू होती। आज तक एक भी ढेला न कमाने वाला लड़का प्यार करता और उस प्यार में इतना आगे बढ़ जाता के उस लड़की से शादी की बात करते हुए रूमानी होते हुए डूब जाता। तुम हाथ पकड़ कर उस दरिया से निकाल भी लाती और अपनी बाहों में भरते हुए तालकटोरा गार्डन की झड़ियों में हम दोनों कहीं गुम हो जाते। इस तरह हम दोनों की तरह हमारे सपने आपस में गुथ जाते।

पर सच तो यह है कि हमारे यहाँ नौकरी एक सीमा तक पढ़ाई करने के बाद भी नहीं मिलती। लड़के मेरी तरह धक्के खाते रहते हैं। और लड़कियाँ उन उदास खिड़कियों के पल्लों से झूलती हुई किसी और कमरे में परिवार द्वारा नियुक्त किए गए पतियों की सेवा में दिन-रात जुट जाती हैं। वह कभी नहीं बतातीं। कभी कोई उनका भी सपनों का राजकुमार था, जो उनके सारे सपनों को चुरा ले गया। उन्होंने ऐसा कभी न करने की सीख हिन्दी फ़िल्में और मोहल्लों की मौसियों और चाचियों के मुँह से सुनी कहानियाँ सिखा देतीं।

फ़िर मैंने भी तो कोई वादा कभी नहीं किया। न तुमसे। न ख़ुद से। शायद मुझमें हिम्मत नहीं थी या मैं शुरू से ही डरता था। कहीं तुम मान जाती तब? शुरू से ही मैं एक डरा हुआ लड़का बना रहा। खोया खोया-सा। कभी-कभी तो लगता जैसे मैंने इस खोयेपन को ओढ़ लिया था। क्योंकि मुझे कहीं तुम्हारी आँखों में इस खो जाने को लेकर एक अजीब-सी कशिश दिखी। पर असल बात यह नहीं थी। पता नहीं तुममें पता नहीं क्या था, जिसे लेकर में खिंचा चला जाता। हर बार जब भी देखता, तुम मुझे फ़ारुख शेख़ वाली दीप्ति नवल दिखने लगती।

शायद यहबात बहुत देर से तुम्हें पता चली। या पता नहीं, आज तक पता ही न हो तुम्हें। तुम्हें लेकर आज तक वापस लौट लौट आता हूँ। पता नहीं ऐसा क्या है जो वापस मुझे वहीं ले जाता हैं। शायद कोई अधूरी बात अभी भी कहीं किसी कोने में रह गयी होगी। या हो सकता हैं, उस अधूरेपन में ही वह ताकत हो जो लौट-लौट मुझमें तुम्हारी शक्ल के पास वापस लाता रहा है। तुम वह आखिरी चेहरा बनी रही, जिसे चाहकर भी कुछ नहीं कहा। कहा भी तब, जब हम एक पल बाद कभी न मिलने के लिए लौट जाने वाले थे। वह बहुत कमज़ोर-सी कोशिश थी। जिसमें मुझे पता था,  कोई भी नहीं रुकता। न मैं न तुम। और देखो सचमुच मेरा अंदाज़ कितना सही था। एक बार हुआ भी कि वापस लौट जाने के कुछ रास्ते छोड़ जाऊँ। पर नहीं। किसी पत्थर पर कोई निशान नहीं छोड़ा, जिसे पहचानकर हम कभी कहीं मिल पाते।

इतनी बातें कहते हुए भी नहीं लगता कि मैंने कुछ भी कहा है। जैसेतुम्हें नहीं कहा। यहाँ तक आते-आते मेरी आँखें दर्द करने लगी हैं। सिर भारी हो रहा है। लगने लगा है मेरी तरह मेरी बातें भी उतनी ही झूठी हैं। जैसे आगे इस आख़िरी झूठी बात को कह कर ख़ुद को जुगुप्सा से भर लूँगा कि मेरे अंदर उन दिनों यह ख़याल न जाने कितनी ही बार दिल में, दिमाग में, मेरी सैकड़ों नसों में ख़ून की तरह दौड़ने लगा था कि एक आख़िरी बार तुमसे पूछकर इस किस्से को हमेशा के वहीं दफ़न कर देते हैं। क्या पता शायद जब तुमने अपनी शादी के लिए हाँ कहा होगा, तब तुम भी मेरी तरह इन ख़यालों से भर गयी होगी। कहीं-न-कहीं मुझे कई सालों तक लगता रहा तुम बिलकुल मेरी तरह सोचती होगी। फ़िर हम दोनों अगर हमक़दम बनते तो कैसा रहता। क्या हम सपनों के बाहर भी साथ रह पाते। तुम ख़ुद पूछो। मुझे नहीं पता।

पर अब इन बातों का किसी सायको एनालिस्ट के अलावे किसी के लिए कोई मतलब नहीं। हम बिन नौकरी वाले डरे हुए लड़के करते तो अधूरे प्यार हैं पर उन्हे कितने सालों तक हम अपने दिलों में जिंदा रखेंगे, यह नहीं जानते। हो सकता है, आज भी तुम्हें इन बातों में शिद्दत से किया हुआ बेतरतीब प्यार जैसा कुछ दिख जाये। वह शायद हम सबमें ऐसे ही थोड़ा-सा बचा रह जाता होगा। सच में इतने सालों बाद वह तुम्हारे दिल के कोने में छिप भले जाये पर अपने अंदर झाँककर देखना, तुम्हें भी मैं ज़रूर नज़र आऊँगा। वहीं चुप-सा।खोया खोया-सा

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अपनी मानवता को छोड़ हम सब जानवर हो गए - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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