अक्तूबर 18, 2015

दीवान-ए-ख़ास : जो पिच्चीकारी जानते हैं

आज कल यह तर्क बहुत चल रहा है कि जनता भी विरोध दर्ज़ करना चाहती है, पर उसके पास सुघड़ भाषा और उसकी पिच्चीकारी करती मुहावरेदार शैली नहीं है। वह सब, जो इसकी ओट में पीछे खड़े हैं, इस बहाने से आम जनता के प्रवक्ता बनकर उभरे हैं। वह ख़ुद इस पद पर नियुक्त कर लिए गए हैं। यह संगठित रूप से विरोधी या असहज या स्पष्टवादी लहजों को ख़त्म कर देने की अतिवादी ज़िद है।

{इक्कीस सितंबर, सुबह ग्यारह बजकर चालीस मिनट · नयी दिल्ली }

इनाम इकराम के अलावे
यह जितने भी लोग प्रतिरोध, असहमति, विवेक के नाम पर लेखकों के इनाम और इकराम लौटाने की बात पर उनकी पीठें ठोक रहे हैं, क्या उन्हें बिलकुल भी नहीं पता कि यह अपनी बिरादरी के एक सदस्य की हत्या के बाद लामबंद हुए हैं। वह कभी किसानों के द्वारा की जा रही आत्महत्या पर नहीं बोले, भ्रष्टाचार को अपनी आँखों के सामने घटित होता देखते रहे।

वह तब भी कुछ नहीं बोले जब बेरोज़गारी से इस देश के नौजवान अपनी जवानी में इन कन्धों पर अपना बोझिल बुढ़ापा लिए घूमते रहे। सांप्रदायिकता और जातिवाद से देश झुलसता रहा वह तब भी चुप रहे। आज अपनी 'वैधता' को बचाए रखने के लिए जन सरोकार की आड़ में छिप रहे हैं। अगर लेखक होना औरों से अधिक संवेदनशील हो जाने की वरीयता प्राप्त कर लेना है, जादा जिम्मेदार हो जाना है, तब तक मेरी असहमति रहेगी। यह लेखक नहीं कुछ और हो जाने की आज़ादी लेना है।

{सत्रह अक्तूबर, रात ग्यारह बजे लगभग। नयी दिल्ली। }

जो बातें रह गईं, दोबारा से
अभी लगता है, दो-तीन बातों को और स्पष्ट करने की ज़रूरत है या उन्हें फ़िर से कहा जाना चाहिए।

‘अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता’ लेखकीय जीवन के लिए मूलभूत आधार है। उसके लिए एकजुटता प्रदर्शित करने, राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध करने के कई सारे तरीके हो सकते हैं। पुरस्कार लौटाना आततायी शासक से रूठ जाने का अभिनय करने जैसा है। विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं, जो ख़ुद को दरबारी कवि-लेखक मानते हैं और यह मानते हैं पुरस्कार में दी गयी राशि सत्ता ने अपने घर से दी है, वह राशि लौटा सकते हैं।

फ़िर आगे के रचनात्मक प्रतिरोध के लिए कोई नक्शा क्या है? अगर उस दिन अशोक वाजपई एनडीटीवी पर नहीं बोलते, तब क्या कोई मीडिया घराना इस ख़बर की ‘सेलिंग पावर’ को देखता? शायद नहीं। और जैसी ख़बरे नामवर सिंह की तरफ़ से आ रही है कि ऐसा करना ‘साहित्य अकादमी’ को अस्थिर करना होगा, तो वह निराधार लगती हैं। वह ऐसा बोलकर ‘सेफ़्टी वॉल्व’ बनना चाहते हैं।

मैं अभी भी अपनी उस बात पर कायम हूँ कि यदि लेखक होना औरों से अधिक संवेदनशील हो जाने की वरीयता प्राप्त कर लेना है, जादा जिम्मेदार हो जाना है, तब तक मेरी असहमति रहेगी। यह लेखक नहीं कुछ और हो जाने की आज़ादी लेना है। साथ में आज यह भी जोड़ देने की ज़रूरत है कि इस आलोचना से यह बिलकुल भी अर्थ नहीं लेना चाहिए कि हम सहिष्णु, समरस, संवेदनशील समाज के निर्माण में लेखकों की भूमिका को कम करके देख रहे हैं। पर सवाल क्या सिर्फ़ इनाम और मिली रकम तक सिमट कर नहीं रह गए हैं।

उन्हें तो अभी और आगे जाना था। ख़ैर..

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