अक्तूबर 28, 2015

चुप घर

वह एकदम शांत क़िस्म की दीवारों वाला घर था। छिपकली भी आहिस्ते से उनसे चिपकी रहती और कोई जान भी न पाता। जाले दरवाज़े के पीछे छिपकर सालों से वहीं बने हुए थे। पलस्तर धीरे-धीरे अम्मा की अधीर आँखों की तरह उखड़ रहा था। सफ़ेदी को सीलन के साथ पपड़ी बने ज़माना बीत गया, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ा। सब उस फ़र्श पर चिपके गोबर की तरह चितकबरी रोटी खाते रहे। कोई कुछ बोलता, उससे पहले ही खाकर उठ जाते। सब एक-दूसरे से बोलने को होते पर बोल नहीं पाते। सबके पास न जाने कबसे यह अनकहे अनुभव ऐसे ही अनसुने रह गए।

यह न सुनकर सुनना, इस घर की अपनी अलग पहचान थी। सबने अपने-अपने बर्तन चुन लिए थे। फूले की थारी बाबा की।  इस्टील वाली बड़की अम्मा की। एलमुनियम का कटोरा काका का। दो छोटे चिम्मच लड़कियों के। एक-एक कटोरी उस छोटकी बिटिया के जिसके पेट से बाद में यह दोनों पैदा हुईं और तबसे घर समेत सब कुछ भी कहना भूल गए। वह बस अपने बर्तनों को ख़ास धुनों में बजाते और सब समझ जाते।  किसने किससे क्या कहा। कौन क्या कह रहा है। किसे क्या चाहिए।

इस कहानी को कहता कोई नहीं, बस सब अपनी याद में याद करते। एकबार जेठ का महिना रहा। तपता। पिघलता। चिपचिपा। उमस भरा। बरसात की एक बूँद भी नहीं बरसी थी तब तक। तब इस गाँव के गरम दिमाग वाले परमुख जी इस घर तलवार लेकर आए और सबकी ज़बान काटकर अपने साथ ले गए। कोई कुछ नहीं समझ पाया। कोई कुछ नहीं बोल पाया। सब जैसे अंधे हो गए। सबसे पहले उन्होने उसकी जीभ काटी, जो पंचायत में हारकर भी कोरट जाने की धमकी देती रही। एक वो दिन है, एक आज का दिन है। तब से लेकर आजतक यहाँ जब भी कोई बच्चा पैदा होता, उसका बाप सबसे पहले उसकी मुलायम-सी गुलाबी जीभ काटकर उनके दुआरे चढ़ाये आता। बिन कहे। यह जिंदा रहने की पहली शर्त थी। यही आख़िरी शर्त थी।

तब से यह चुप घर था। दूर से भी चुप। पास से भी उतना शांत। बिन झिलमिलाये। कोई हरकत, किसी भी तरह की हरारत से मुक्त। अंदर-ही-अंदर कुढ़ता, उमस भरा, साँस लेता, फेफड़े जलता, फ़िर भी मरा हुआ। चुप घर।

{चुप घर: एक, दो, तीन

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - राजेंद्र यादव जी की पुण्यतिथि में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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