अक्तूबर 02, 2015

‘डिजिटल इंडिया ’ का विखंडन

डिजिटल इंडिया ऐसी तकनीक साबित होगी, जिससे अब अंतरजातीय विवाह सुगमता से होने लगेंगे, जातिवाद देश से उखड़ जाएगा। फ़ेसबुक मेट्रीमोनियल साइट में तब्दील होने जा रहा है। कोई मुजफ्फरनगर, बथानी टोला अब नहीं होगा। कोई किसी के लिए हिंसक शब्दावली का इस्तेमाल नहीं करेगा। अब यहाँ सौहार्द, शांति, परस्पर विश्वास का संचार होगा। डेंगू से यहीं विजय प्राप्त कर ली जाएगी, गलियों नालों की सफाई की नौबत नहीं आएगी। एमसीडी वाले वैसे ही साल भर खोखीयाए रहते हैं।

गोरखपुर के दिमागी बुखार में अब सिलिकन घाटी से बैठे-बैठे स्वस्थ लाभ हो जाया करेगा, सब वहीं से नियंत्रित होगा। नौकरियाँ तुरंत लग जाया करेंगी। अधिग्रहित जमीन के बदले किसानों और आदिवासियों को यहाँफ़ार्मविले ’ की जमीने दी जाएँगी। फ़िर बरसात, उर्वरक, क़र्ज़े, आत्महत्या सबको एक बार ही ठिकाने लगा दिया जाएगा। देश के ऐसे संभावित भविष्य को देख कर मेरी आँखें चुंधिया रही हैं। अब और नहीं देखा जाता। आपको बदलाव नहीं दिख रहा, परिवर्तन शुरू हो चुका है; उन तीन रंगों के बीच अशोक चक्र नहीं अब लोग ख़ुद आ गए हैं।

अट्ठाईस सितंबर, सुबह सात बजे, बाथरूम जाने से पहले· नयी दिल्ली।

दोपहर
यह जो लोग एफ़बी पर अपने प्रोफ़ाइल की तस्वीर को रंगीन किए जा रहे हैं, उन्हे पता भी है, यह 'डिजिटल इंडिया' किस चिड़िया का नाम है। हम 'मेक इन इंडिया' की बात करते हुए विदेसी कंपनियों की आउटसोर्सिंग पर निर्भर हो गए। हमारे परधान सेवक सिलिकन वैली में जूतियाँ घिस रहे हैं। अपरोक्ष रूप से भारत सरकार ऐसा ढाँचा खड़ा करने में अपनी अक्षमता प्रकट कर रही है। इसे किस तरह लेना चाहिए पता नहीं।

इसे नेट न्यूट्रेलिटी से कैसे जोड़ेंगे, इस पर थोड़ी देर बाद।

शाम
एक 'डिजिटल इंडिया' की शुरवात समाजवादी सरकार उत्तम प्रदेश में लैपटॉप बाँटकर  पहले कर चुकी है। जहाँ सड़कें नहीं हैं, शौचालय नहीं हैं, बिजली नहीं है, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था से सब पीड़ित हैं, उन ग्रामीण अंचलों में इंटरनेट पहुँच जाने से क्या बदल जाएगा, पता नहीं। जो काम ठीकठाक तरीके से रेडियो जैसा सस्ता सुलभ माध्यम नहीं कर सका, वहाँ इस सुविधा के आ जाने से दुनिया एकदम पलट जाएगी।

इस परिवर्तनकामी योजना से उन लोगों को पता चल जाएगा कब बैंक वाले घर और खेत कुर्की करने आने वाले हैं। उन्हे यह भी पता चल जाएगा कि इस बार भी मौनसून ठीक नहीं रहने वाला, इसलिए शहर पलायन कर जाना ही ख़ुद को जिंदा रख पाने का एक मात्र विकल्प बचाता है। इस तरह की असीम संभावनाओं को और टटोला जा सकता है। आप चाहें तो नीचे बिन्दुवार इसमें कई छूट गयी संभावनाओं को सूचीबद्ध कर सकते हैं।

गाँधी जयन्ती की डिजिटल सुबह
अभी हफ़्ता भर नहीं हुआ परधान सेवक की जूतियाँ घिसे। कैलिफ़ॉर्निया से लौटे हैं। उसी गूगल ने कल एनी बेसेंट का डूडल बनाया, लेकिन आज वहाँ से गाँधी गायब हैं। वह संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस भी भूल गया।

वही गूगल डूडल आज इटली में 'ग्रैंड पैरेंट्स डे ' मना रहा है। जो लोग समझ रहे हैं सुंदर पिचई की शक्ल में एक भारतीय है और वह 'डिजिटल इंडिया' की क्रांति का अगुआ बनने जा रहा है, तब उन्हे एक पल सोचना चाहिए।

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