अक्तूबर 15, 2015

एक पति के नोट्स

पता नहीं अंदर ख़ुद से कितने झूठेवादे कर रखे हैं।

एक मेंहम शादी के बाद पहली बार अकेले घूमने निकलने वाले हैं। मैं सारी ज़रूरी चीजों में सबसे पहले कैमरे को संभालता हूँ। जिद करके उधार ही सही, नौ हज़ार का डिजिटल कैमरा ले आता हूँ। कहीं पहाड़ पर जाएँगे, तब अपनी साथ वाली तसवीरों वाली याद कैसे लाएँगे। अपने आने वाले दिनों में जब छोटे नन्हें-मुन्हे पूछेंगे, तब हम कहानी की तरह एक-एक बात बताते जाएंगे। दूसरे में, हम अपनी पहली सालगिरह में आगरा जा रहे हैं। मैंने किसी को बताया नहीं है। बस जैसे जैसे दिन पास आएगा, मैं कह दूँगा। तुमने ताजमहल नहीं देखा है। हम साल भर बाद भी कहीं जा नहीं सके हैं। इसलिए इस सरप्राइज़ को तुम्हें चुपके से दे दूँगा।

तीसरे में इस दिसंबर हमराकेश के यहाँ होते हुए पंचमढ़ी जाएँगे। हम डेढ़ साल में सिर्फ़कानपुर के अलावे कहीं नहीं गए हैं। तुम्हारी सहेली की शादी न होती तो वह भी मौका कब लगता, कह नहीं पाता।

मेरी दिक्कत है कह न पाना। इनसपनों को हक़ीक़त में बदलने के लिए कुछ भी करने की जद्दोजहद में फँस जाना। न मालुम किस चीज़ के टूट जाने के डर से डरता रहा हूँ। इधर एक और सपना वादे की तरह घूमता जा रहा है, के अगर वजीफ़े के पैसे मिलने लगेंगे तो कैसे भी करके पहाड़ों पर हफ़्ता भर के लिए चले जाएँगे। इस कैमरे से कुछ यादों को अलगनी पर टाँगने के लिए लेते आयेंगे। पर सच कहूँ, मुझे नहीं पता पैसे मिलेंगे भी या नहीं। हम कब जा पायेंगे। देखना है, आगे सबकैसा है। इसलिए चुप हूँ। 

{तस्वीर असली है। महेंद्र भल्ला ही हैं। ‘एक पति के नोट्स’ वाले । बाक़ी कुछ असली नहीं। एक -एक शब्द झूठ है, और कुछ नहीं। }

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