अक्तूबर 27, 2015

किस्सा किताबों का


पुरानी दिल्ली, दरियागंज। किताबों की ज़िंदगी भी कैसी होती है। कभी ऐसा भी होता है, हम अचानक उस किताब तक पहुँच जाते हैं, जो इसी शहर में न जाने किसकी अलमारी में, मेज़ पर, कहीं अलगनी पर टंगे झोले में कब से पड़ी रही होंगी। फ़िर एक दिन आया होगा, जब उनकी कीमत मूल्य विहीन होकर धूल खाने से जादा नहीं रही होगी। वहाँ देखता हूँ, किताबों के ढेर के ढेर पड़े हैं। बेतरतीब। वह कौन से पल होते होंगे, जब हम किताबों को अपने घरों, दीवारो, छतों से निकालने के ख़याल से भर जाते होंगे। समझ नहीं पाता, कैसे ख़ून की तरह हमारी नसों में बहती किताबों को बेचने के लिए वह तय्यार होते होंगे।

अभी इसी इतवार की बात है, अज्ञेय की एक किताब है, आदम की डायरी। किताब खोलते ही उनका जीवन परिचय है। भारतीय आधुनिकता के पुरोधा कवि, कथाकार, आलोचक, संपादक। बिलकुल इसकी पीठ पर, अगले पन्ने पर बॉल पेन से लिखा है, ‘प्रिय रश्मि को जन्मदिन पर सप्रेम भेंट’। लिखने वाले का नाम देवेन्द्र है। तारीख़ पड़ी है, बीस जुलाई दो हज़ार दस। सरसरी निगाह डालने पर कहीं किसी पन्ने पर कोई पैन-पेंसिल का निशान तक नहीं है। इस छोटी-सी कहानी में नायिका का नाम मैंने बदल दिया है। बाकी सब वही है। यह कैसे हुआ कि एक कहानी की किताब घर में जगह नहीं बना पाती। हो न हो यह दोनों नाम शशि-शेखर के उसी दौर को दोहरा रहे हैं। हमारा समाज आज भी प्रेम के लिए सहिष्णु नहीं बन पाया है। उसे बनना है।

ऐसे ही दो किताबें अनुपम मिश्र की मिली। गांधी शांति प्रतिष्ठान से प्रकाशित इन पुस्तकों पर उनके हस्ताक्षर हैं। पहली किताब, ‘राजस्थान की रजत बूंदें’, किन्ही ‘प्रिय संजय जी को भेंट’ है। अपने हाथों से उन्होने तारीख भी लिखी है, एक फरवरी, सन् दो हज़ार। दूसरी किताब है, ‘आज भी खरे हैं तालाब’। यह केवल ‘सादर भेंट’ है। यहाँ भी शब्दों के ऊपर शिराएँ जल की लहरों की तरह तरंगित हैं। गतिमान हैं। उसके अगले पृष्ठ पर उस पुस्तक के क्रेता ने अपने साइन करके तीस अगस्त दो हज़ार दो की तारीख डाली हुई है। ‘साफ़ माथे का समाज’ दिखी, पर मेरे सामने ही कोई और खरीदकर ले गया। ख़ैर।

फ़िर जो आप इतनी देर से ऊपर लगी यह तस्वीर घूर रहे हैं, इस किताब का किस्सा भी यही है। आलोक श्रीवास्तव की अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित कृति 'आमीन' का राजकमल प्रकाशन से यह तीसरा संस्करण है। और मेरी तरह आप ठीक पहचान रहे हैं। पहले मैं भी आश्चर्य में पड़ गया था। कैसे किसी की सप्रेम भेंट की गयी कृति के साथ ऐसा बर्ताव किया जा सकता है। जबकि आप एक साहित्यिक ब्लॉग जानकी पुल के मॉड्रेटर कहे जाते हैं। जिनकी दुकान से यह किताब ली गयी है, उन्होने बताया, क्या बताएं भाई, कॉलेज में उनके तो चार कमरे किताबों से भरे पड़े हैं। हमने तो सारी किताबें चौबीस हज़ार में खरीदी हैं। अब हाफ में भी न बेचें तो कैसे काम चलेगा। शायद हिन्दी के उपरोक्त लेखक द्वारा प्रयुक्त की गयी यह युक्ति, इस रूप में 'पुस्तकों का लोकतंत्रिकीकरण' है के हमने अपने यहाँ से किताबें निकाल दीं हैं, अब खुले बाज़ार में उन्हें कोई भी खरीद सकता है।

हो सकता है, वह पुलिहा से किताबें फेंककर पानी की गहराई नाप रहे हों। तैरने से पहले नापना, बुद्धिमानी का लक्षण है।

8 टिप्‍पणियां:


  1. जय मां हाटेशवरी...
    आप ने लिखा...
    कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
    हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
    दिनांक 28/10/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
    पांच लिंकों का आनंद पर लिंक की जा रही है...
    इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
    टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    कुलदीप ठाकुर...

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  2. उत्तर
    1. जी साब, जरूर। कब आ रहे हैं आप दिल्ली।

      हटाएं
  3. शायद उनकी कोई मजबूरी होती होगी..

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