अक्तूबर 26, 2015

मन भी क्या अजीब चीज़ है

पता नहीं यह दिन कैसे हैं? कुछ भी समझ नहीं आता। मौसम की तरह यह भी अनिश्चित हो गये हैं जैसे। जैसे अभी किसी काम को करने बैठता हूँ के मन उचट जाता है। खिड़की पर पर्दे चढ़ाकर जो अंधेरा इन कम तपती दुपहरों में कमरे में भर जाता है, लगता है, वहीं किसी कोने से दाख़िल होकर मेरे मन में भी बैठ जाता होगा। उस लाल ढलते सूरज की परछाईं में लेटे-लेटे खोने लगता हूँ। मन किया तो धीमे-धीमे गाने की आवाज़ को सुनने की कोशिश में लगता नींद आने वाली है। नींद वहीं दरवाज़े की ओट में या खिड़की के शीशे पर घात लगाए बैठी रहती है। मुझे दिन की दिहाड़ी के लिए किसी लेबर चौक पर सुबह-सुबह नहीं खड़े होना। इस इतिहास चक्र में हमारे परिवार के पास जो भी सांस्कृतिक पूंजी है, उसके सहारे मैं अभी थोड़ी देर बाद रोटी या दाल के लिए चौराहे की दुकान तक चिरौरी करने नहीं बल्कि कालीबाड़ी की तरफ़ रातरानी की सुगंध ढूँढ़ने जाऊंगा। इसतरह हम सब अपनी अपनी ज़िंदगियों को रोज़ तलाशते हैं। आहिस्ते-आहिस्ते। कोई बताता नहीं है।

जैसे मेरे दोस्तों को किसी ने नहीं बताया, उन्होने ख़ुद इस बात को जान लिया। के जिन परिवारों से वह आते हैं, उनमें पैसा कमाने का हुनर सिर्फ़ उनके पिता के पास था। जिसे उन्होने इतने सालों तक संभाले रखा। यहाँ तक के अपनी पत्नी, उनकी माताओं तक को नहीं दिया। वह वही हुनर अब आपकी बहन को न देकर सबकी निगरानी में हमारे सुपुर्द कर रहे हैं। अब वह सब इस देश में छितर गए है, सब कमाने और निचोड़ने लगे हैं। अब परदेस में उग आए उन नए घरों को संभालने लायक लड़कियों की तलाश में जुट गए हैं। अम्मा तो अब वैसे भी बूढ़ी हो चलीं हैं, पिताजी को संभाल ले वही ठीक है। पर ऐसे बहुत से लड़के होंगे जो पार साल और उसके भी पहले बिन नौकरी माता-पिता की मर्ज़ी से शादी कर चुके होंगे। उनके निर्णयों को किस नज़र से देखने की ज़रूरत है, पता नहीं। पर इसके अलावे भी बहुत-सी बातें होंगी। नहीं होंगी।

जैसे मेरा जनवरी में ख़रीदा फ़ोन अब किसी नयी एप्लीकेशन को क्यों नहीं डाउनलोड कर पा रहा। क्यों पूरा दिन इस कमरे में रहने के बावजूद अभी दस मिनट पहले उठा और बोतल से पानी गिलास में डालकर पिया। क्या मौसम इतना ठंडा हो गया है या कोई और बात है। क्यों चाँद को देखने के लिए खिड़की से पर्दे को हटा दिया है। ऐसा ख़याल पहली बार कब आया के कुछ कुछ दिन उन दोस्तों के नबरों को ब्लॉक लिस्ट में डालकर देखते हैं। कभी उनको याद आएंगे भी। क्या उन्हे कभी इतनी फ़ुरसत होगी के अपनी फ़ोनबुक में मेरा नाम देखकर कुछ सोचते होंगे। अब क्या ऐसे दिन आ गए कि जिन बातों को डायरी में छिपाकर रख लेना था, उन्हें यहाँ शाया करने लगा। या शायद हम उन आख़िरी लोगों में हैं, जो कागज़ पर कलम से भी लिखते हैं और इस हाइपर रियल मीडियम पर भी अपना दखल रहते हैं। वैसे सच है, इधर कागज़ पर लिखना कम हुआ है। पर यह भी सच है, उतनी शिद्दत से शैफ़र, लैमी, सरवेक्स के फाउंटेन पैन ख़रीदने लगा हूँ। कुछ नए पन्ने कहीं से मिल जाएँ। कई बातें अधूरी रह गयी हैं, कुछ अधूरी छोड़ दी हैं, उन्हे सिरे से देखते हुए तरतीब से लगाना है। ऐसे लगाना है कि दूर से दिख जाए।

दिख जाये कि यह भी कोई जगह है, जहाँ अपने मन को आसमान में ढलते चाँद की तरह नीचे, अपने दिल में उतरते देख सकते हैं। वह ठंडक जो इस शहर की आबोहवा में कहीं गायब हो गयी है, उसे कुछ देर महसूस कर सकें। उन आँखों के कोनों में आ गयी नमी से धुँधली होती दुनिया में ख़ुद का अक्स झिलमिलाता देख पाएँ। सोचा था, बड़े शानदार तरीके से इसके लेआउट और पूरे हुलिये को बदल दूँगा। आप देख कर बताइये, कुछ कमियाँ ज़रूर हैं पर कैसा लग रहा है। चार दिन से लगा हुआ हूँ। एचटीएमएल एडिट करना नहीं आता, फ़िर भी ज़िद से इतना सुधार पाया। बस अभी इतना ही। कॉफी ठंडी हो रही है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. एचटीएमएल एडिट करना नहीं आता, फ़िर भी ज़िद से इतना सुधार पाया। बस अभी इतना ही।..थोड़ा नहीं आपका ब्लॉग तो किसी साइट बनाने वाले से किसी भी एंगल में कम नहीं ...काम समर्पित भाव और लगन से किया जाय तो कठिन राह आसान बन जाती है ...

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    1. जी, कभी-कभी कुछ काम ही तो मन से हो पाते हैं।

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