अक्तूबर 13, 2015

चुप कविता

मैं कभी कुछ नहीं बोलूँगा, बस चुप रहूँगा। आप जब कुछ कहेंगे, तब मैं कुछ नहीं कहूँगा। आप देखने को कहेंगे, मैं बिलकुल नहीं देखुंगा। आपकी सहजता को असहजता में नहीं बदलने दूँगा। आप सहज रहें इसलिए खुद ही असहज होता रहूँगा। कुछ बोलने से पहले कुछ नहीं बोलूँगा। आपके लिए अपना बोलना स्थगित कर कहीं किसी खाली कमरे में बैठा रहूँगा। आप ढूँढ़ना चाहेंगे, तब भी ढूँढ़ नहीं पाएँगे। मैं कहीं बाहर नहीं, मैं कहीं आपके अंदर ही बैठा रहूँगा। वह अँधेरा काला कमरा कुछ और नहीं आपका डर होगा। डर जो आपके दिलों की डरी दीवारों-सा चुप कोने में खड़ा होगा। आपको जिस दिन, जिस पल लगे, आप जैसे कहेंगे, मैं अपनी पेंसिल से लिखी सारी पंक्तियाँ मिटा दूँगा। आप बस एकबार कहकर देखिये। 

2.
पर क्या करूँ आपके कहने से पहले ही भूलने लगा हूँ। मेरे कागज पर लिखी मेरी कोई भी मिटाने लायक स्याही से नहीं बनी है। अभी देखा तो दिखी वह पंक्तियाँ ख़ून से बनी स्याही से बनी हैं। शायद यह ख़ून मैंने वहाँ से इकट्ठा किया था, जहाँ वह मारने वाले, उन्हें मरा मानकर लौट आए थे। मैं वहीं से गुज़रता हुआ एक छोटा-सा तिनका था। मैंने उसे स्याही समझ समेट लिया था। अपने अंदर इस कविता को उगता देख उसे पहले ही कह रहा हूँ। क्या पता आप कहने की प्रक्रिया को ही अवैध घोषित न कर दें। आपको साथ बताता चल रहा हूँ। बताना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि मैं डर गया हूँ। मुझे डर आपसे नहीं लगता। मुझे डर लगता है, अपने अंदर इस घटना के घटित होने के पल से।

3.
उस पल क्या पता मेरी किसी कही बात से आप डर जाएँ। डरकर कहीं छिप जाएँ। मैं आपकी हर बात मान रहा हूँ। क्या आप मेरी एक बात भी न मानेंगे। जाइए। वो सामने पेड़ के पीछे अपने गिरेबान में झाँक कर देखिये। कॉलर कितना गंदा हो गया है, आपका। चितकोबरे की तरह कितने छींटे पड़े हैं वहाँ। देखिये वहाँ छिपे हुए आपके औज़ार भी कितने कमजोर होते जा रहे हैं। जो मेरे बेहैसियत शब्दों में ताक़त भर रहे हैं। ख़ून से बड़ी तो कोई ताक़त नहीं जी। चलिये, हम दोनों अपना काम करते हैं। आप ख़ून करते रहिए। हम ख़ून लिखते रहेंगे।

2 टिप्‍पणियां:

  1. क्या खूबसूरत अंदाज़ है. मन को उभरानेवाली एक दिलकश रचना.

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