अक्तूबर 09, 2015

उन बातों पर दोबारा गौर करते हुए

पता नहीं कभी-कभी क्या होता है, हम चाहकर भी नहीं समझ पाते। शायद तभी उन बीत गए दिनों में लौट कर उन्हें दुरुस्त करने की ज़िद से भर जाते होंगे। अगर ऐसा न होता तब मुझे भी हलफ़नामे की तरह दोबारा उन बातों पर गौर करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सोचता हूँ, अगर मेरे मन में वह ख़याल दोबारा न आए होते, तब उन सवालों का क्या होता। मेरा अवचेतन कब तक उनसे बचता रहता। इसे छिपना भी कह सकते हैं। अगर कोई फ़ेहरिस्त होती तो उनमें सबसे ज़रूरी सवाल होता, क्यों ज़रूरी था उन बातों का कहा जाना। उससे भी गंभीरता से सोचने वाली बात होती, उस रात में ऐसा क्या था कि वही सब लिखा गया। कुछ और नहीं।

हम सबकी ज़िन्दगी में ऐसे दौर आते हैं, जब हम सब कुछ दिन के लिए मर जाना चाहते हैं। फ़िर जब वह दौर ख़त्म हो जाता होगा, तो लौट आने के ख़याल से भर जाते होंगे। इधर भी कुछ ऐसे ही हो रहा होगा शायद। शायद इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद कोई मुझे चाहकर भी कोई मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह न दे पाये। पर क्या करूँ। इन बीतते वक़्त में लगातार ऐसा होता गया हूँ। मुझे यह स्वीकार करने में किसी भी तरह की कोई शर्म या अवसाद नहीं महसूस हो रहा। ऐसा लिखते हुए और ऐसा सोचते हुए भी सपनों के साथ हूँ। भले पन्नों पर कितना भी पीछे चला जाऊँ, कुछ बातें सिर्फ़ कहने के लिए कहते हैं। यह ईमानदारी का लबादा ख़ुद को बचा ले जाने के लिए ओढ़ना पड़ता है। लेकिन वह झूठ नहीं है तो सच भी नहीं है। एक बारीक से परदे के पीछे सब साफ़-साफ़ है। उस अधूरेपन में, उसके लिए जो हम सबमें एक अजीब तरह की कशिश है। वह हमें हमारे आज से कहीं दूर उस जगह ले जाती है, जहाँ वह अधूरा है।

हमें लगने लगता है, जहाँ हम हैं वहाँ चीज़ें वैसी नहीं हैं जैसी वह हमारे मन में थीं। हमें लगता है, हम एक बार फ़िर वहीं पहुँच जायें, जहाँ हम सब चीजों को वैसे का वैसा छोड़ आए हैं। पर यह हमारी सबसे बड़ी भूल है। वह हू बहू कहीं नहीं रहता, सिवाय हमारे मन के। हमारा मन खुद को बचाए रखने के लिए यह दुनिया रचता है। हमें लगता है, एक जगह है जो अभी भी हमारे काबू में है। लेकिन उस छोड़ने से लेकर आज तक कुछ भी वैसा बचा नहीं रहता। उस तिलिस्म में हम खो जाते हैं। यही हम चाहते भी हैं। यह अपने दिमाग को कुछ देर के लिए स्थगित कर देना है। मैं भी ऐसे ही इस दुनिया से कुछ इस तरह से गायब हो जाना चाहता हूँ, कि जब लौटूँ तो कम से कम एक दफ़्तर ऐसा हो जो मेरा इंतज़ार कर रहा हो। जहाँ सबकुछ मेरे आने के बाद ही चलना शुरू करे। सच मुझे लगता है, यह ख़राब दिन भी चले जाएँगे।

{ उस रात तिलिस्म से निकला पन्ना }

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