अगस्त 10, 2015

ये दुनिया अगर मिल भी जाये..

फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, पूना की बात

पहली बात कि यह FTII के छात्रों के प्रतिरोध को लेकर या उनकी प्रतिबद्धता को लेकर कोई शंका या ऐसा कोई भाव नहीं है लेकिन इसके अलावे भी ऐसी बहुत बड़ी जगह थी, मौके थे, जिसके अवसर उन्होंने खो दिए. सिर्फ़ एक भगवा निदेशक के संस्था पर थोपे जाने का विरोध करके आप क्या जताना चाहते हैं?

क्या आप सब वह लोग हैं जो स्वयं को दक्षिणपंथी राजनीति से अलग दिखाते हुए वैचारिक मोर्चाबंदी की जनवादी कड़ी को और मज़बूत करते हुए आगे बढ़ रहे हैं या यह सिर्फ़ ढकोसला है. अभिनय कैसे किया जाए, इसकी कोई फ़ाँसीवादी किताब रही होगी।

हो सकता है, संवाद अदायगी में 'भाजपा जिंदाबाद' कहना अनिवार्य कर देने का भय रहा हो या कैमरे को पकड़ने की केसरिया ट्रेनिंग भी होती होगी या ऐसे कई संभावित खतरों को आपने चिन्हित किया होगा। मज़ा तो तब आता, जब आप उनके वहाँ रहते अपनी आवाज़ बुलंद करते। आप तो पहले ही डर गए. कुछ सीखिए आईआईटी मद्रास के अंबेडकर पेरियार स्टडी सर्किल से.

{4 अगस्त · नयी दिल्ली, रात आठ बजे। }

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