अक्तूबर 19, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

हम कभी नहीं सोचते, पर हो जाते हैं। कितने दोस्त बन जाते, इसी सब में। पर फ़िर भी हम तो दोस्त उसी के बनना चाहते। मन मार लेते। सब साथ दिखते। पर हम उसके साथ होना चाहते। कुछ न बोलते हुए भी सब बोल जाते। पर वह कहीं न होती। हम कहीं न होते। जगहें वहीं रह जातीं। हम हम नहीं रह जाते। वह वह नहीं रह जाती।

फ़िर सालों बाद कहीं कोई तस्वीर दिख जाती। कुछ कह जाते, कुछ उसकी आँखों की गहराईयों में ही खो जाते, कुछ नहीं कह पाते। हम सिर्फ़ अकेले नहीं थे। बहुत थे। पर लगता रहता, हम अलग हैं। हम कहते एक बार तो मान जाती। यही सोच बीत जाते।

अक्सर सबके दिल के किसी कोने में कुछ खास उग रहा होता है, जो सामने वाले को दिख भी रहा होता, तो भी वह नहीं दिखता। ऐसा सामने वाले को महसूस नहीं होता, पर सब वहीं होकर भी नहीं होता। सबको पता होता है, कुछ है। पर उन्ही दो को नहीं पता चल पाता।

कह कर भी क्या करते। नौकरी हुई नहीं थी। लड़की कुछ जादा सुंदर थी। साँवली-सी। मेरे रंग की। अपन कुछ खास नहीं रहे होंगे। दिखते भी उलझे-उलझे से। बेतरतीब। बे फ़िकर। अल मस्त। हिज्जे हरबार ऐसे ही उलझ जाते। कुछ नहीं कहना ही सब कुछ कहना रहता।

फ़िर एक शाम होती, जब पुराने दोस्त दोबारा मिल जाते। फ़िर वही पुराने पन्ने पलटते। कुछ उस सामने वाली डेक्स पर बैठने वाली लड़की की बात कह चुप हो जाते हैं। ऐसी ही बहाने बनाकर उन दब गयी डायरियों के मुड़े पन्ने फ़िर खुल जाते। पर अब वह वक़्त कहाँ। कल ही उसने अपनी तस्वीर लगाई है। कहीं पहाड़ों पर ढलते सूरज को देख रहें हैं दोनों।*

*पता नहीं, वह अपने हिस्से वाली इश्क़ की कहानियाँ कब कहेगी ? उसी इंतेज़ार में रात के नौ बज गए। दस, बारह, एक, दो भी बजते हैं, रोज़। पर वह कभी नहीं कहती, अपने हिस्से का इश्क़। मुझे पता है, कभी नहीं कहेगी वह। कुछ नहीं कहेगी कभी।

{ पीछे पन्नों पर, हमारी अधूरी कहानी..}

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर तरीके से उतरा ना ...अब कुछ बाकी न बचे कहने के लिए ...अंतिम पंक्तियाँ सब कुछ कह जाती है ...आपका आभार

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    1. पता भले चलता रहे, पर इंतज़ार खत्म हो जाये, हो नहीं सकता। वह बदस्तूर बना रहेगा ..;)

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