अक्तूबर 11, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

हज़रत निज़ामुद्दीन घंटा भर पहले पहुँचकर वह क्या-क्या कर सकता है, इसकी लिस्ट वह कई बार बनाकर मिटा चुका था। हर डूबती शाम, उसका दिल भी डूब जाता। जिस कमरे पर वह साल दो हज़ार दो से रह रहा था, उसे अपने ही गाँव के एक लड़के को दिलाकर एक ठिकाना बचाए रखने की ज़िद काम नहीं आई। हर रात किसी बहाने वह सौ रुपये मार ही लेता। इसने भी सोचा, चलो किराया ही सही। सोच लेगा दिल्ली और महँगी हो गयी।

वैसे भी यहाँ अब कुछ खास बचा भी नहीं है। नौकरी वहीं सेंटर स्कूल में कर ली है। अब शादी की बात सोचते ही माँ-बाउजी अचानक बूढ़े हो चले हैं। पीएचडी का सपना था। कर नहीं पाया। बस अपने सपने को पीएचडी करता देखता रहा। जब तक वह यहाँ पढ़ रही है, तब तक बार-बार खिंचा चला आता। इसबार उसे कहने आया है। बात फ़ाइनल हो जाये, तभी यहाँ से लौटेगा, चाहे जितने सौ रुपये लग जाएँ।

उसने बात करने के लिए कहीं किसी पुरानी सहेली से नंबर लिया। सोचा रात में खाली रहेगी, पर थकी होगी। सुबह इस बात के लिए ठीक वक़्त नहीं। दोपहर कॉलेज में होगी। फ़िर बात करे तो कब करे? यही सोच-सोच कर उसने दिमाग खराब कर लिया। पर बात तो करनी है। उसके बिना काम नहीं चलेगा। ऐसे सोचते-सोचते उसने नंबर फोन में सेव कर लिया। तब उसे पता चला। वाट्स एप पर उस नंबर से उसी सुबह उसके लिए एक मैसेज था। मैसेज एक प्रोफ़ाइल फ़ोटो थी। उसने बिन कुछ बोले बता दिया। उसकी शादी हो गयी है।

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