नवंबर 12, 2015

जब हमने ब्लॉग बनाया

कभी-कभी ख़ुद को दोहराते रहना चाहिए। अच्छा रहता है। अपनी गहराई का अंदाज़ा लगना बहुत ज़रूरी है। पता रहता है, हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ है। बड़े दिनों से सोच रहा था, कहाँ से शुरू करूँ। मन में एक ख़ाका घूमते-घूमते थक गया। बस हरबार यही सोचता रहा, कैसे दिन हुआ करते थे। अजीब से। खाली खाली। भरे-भरे से। अभी वक़्त ही कितना हुआ है। साल था, दो हज़ार दस। महिना था, अक्टूबर। भाई, पवन के साथ जाकर नेहरू प्लेस से डेस्कटॉप असेंबल करवा लाया। नया-नया सिस्टम था। डर लगता था, कहीं कुछ ख़राब न हो जाये। लेकिन ऐसे तो काम चलने वाला नहीं था। पर अब इसका किया क्या जाए। समझ नहीं आता। बिन इंटरनेट यह एक डिब्बे से कुछ जादा हैसियत रखते हुए भी कुछ करने लायक हालत में नहीं था। हम भी जादा कहाँ जानते थे।

कंप्यूटर घर आ गया। उसके घर आने तक, हमारे घर में उसके लिए कोई जगह ढूँढ़ी नहीं गयी थी। जब वह आया, तब हमने लकड़ी के बक्से पर पहले से पड़ी चीजों को इधर-उधर करके रखने लायक जगह बनाई। उस बक्से के आगे छोटीसी कुर्सी-मेज़  रखकर हम दोनों भाई बैठ जाते। घंटों सोचते, इसमें इंटरनेट कैसे चलेगा? तब तक अक्टूबर दिसंबर में बदल चुका था। दिसंबर धीरे-धीरे नए साल की तरफ़ खिसक रहा था। तब हमारे पास फ़ोन था, नोकिया तिरसठ सौ। उसके साथ 'नोकिया पीसी सुइट' की सीडी थी। वह भी जोश-जोश में हमने 'इन्स्टॉल' कर ली थी। जैसे ही हम यूएसबी केबल से फ़ोन 'कनेक्ट' करते उसमें इंटरनेट से जोड़ने का ऑप्शन भी दिखता। उन्ही दिनों एयरसेल वाले अट्ठानवे रुपये में तीस दिन के लिए अनलिमिटेड ब्राउज़िंग का 'पॉकेट इंटरनेट' पैक दे रहे थे। तबतक हम मन बना चुके थे, इसके लिए एक नया सिम लेते हैं और फ़ोन से यूएसबी लगाकर कंप्यूटर को जोड़ देंगे।

सच में, यह तरकीब चल गयी। अब हमारे कंप्यूटर में भी इंटरनेट आने लगा। पर ऐसा थोड़े हुआ कि जिस दिन इंटरनेट शुरू हुआ उसके दूसरे दिन ही ब्लॉग बना लिया। नहीं। अभी तो हम पहला कदम भी ठीक से नहीं रख पाये थे। उसकी स्पीड इतनी स्लो थी के ऑर्कुट और फेसबुक लॉगिन करने के बाद हम छत का एक चक्कर लगाकर लौटते, तब वह खुल पाता। सब वहाँ अपने नए पुराने दोस्तों को ढूँढ़ रहे थे, हम भी अपना खोजी दस्ता लेकर निकल पड़े। बीए, एमए के याद आते नामों को ढूँढते। जिसका फोन नंबर उससे नहीं ले पाये, उसके नाम वाली हर लड़की की तस्वीर जाकर देख आते। वहाँ वह भी मिली। 'लिव लाइफ क्वीन साइज़'। बीएड ख़त्म होने में कुछ ही दिन रहे होंगे। हमारी फ़ेयरवेल होने वाली थी कि एक ठंडी दोपहर आलोक फेसबुक पर हिन्दी में कैसे लिख सकते हैं, बताने लगा। ब्लॉग लिखने से पहले, हमने हिन्दी में गूगल ट्रांसलिटरेशन  से वहाँ लिखना शुरू किया।

तब लेदेके अविनाश दास के ब्लॉग मोहल्ला का हैडर अपनी तरफ़ खींचता रहता। उसे कैसे लगाया होगा, यही सोचकर चुप हो जाता। तब आरएसएस फ़ीड से विनीत के 'गाहे बगाहे' की ख़बर मिल जाती। यूआरएल भी क्या बनाया था, तानाबाना डॉट ब्लॉग्स्पॉट डॉट कॉम। यहाँ से मेरा मन कुछ-कुछ बना होगा। हिन्दी में एमए था। कुछ किताबें पढ़ी थीं। डायरी लिख रहा था। जनसत्ता, हंस, तहलका लगातार ख़रीदा करता। एक आध प्यार के किस्से ख़ुद बनाने की हिम्मत जानकर लिखने की सोचने लगा। पर पता नहीं कहाँ से अपने ब्लॉग का नाम 'कलमकार' रखने की सूझी। शायद अमृत राय की 'कलम का सिपाही' का कुछ असर रहा होगा। फ़िर तो जो दूसरा नाम मुझे अच्छा लगता, उसे पहले ही कोई ले चुका था। फ़िर एक रजिस्टर के पीछे वाले पन्ने पर ठेठ भदेस नाम एक-एक कर लिखने लगा। पता नहीं वह नामों की सूची कितना आगे तक बढ़ी। पर जो नाम आज इसका है, उसी नाम से इसका वेब पता भी होगा, यही सोचकर नया जीमेल अकाउंट बनाया। नाम सोचा। चापरकरन। सालगिरह वाली पोस्ट  में इसका मतलब भी समझाया।

अब इसके बनने के बाद, सबसे बड़ी दिक्कत थी, इसमें लिखा क्या जाएगा? आज तक नहीं समझ पाया के इसने मुझे कितना गढ़ा और मैंने किस तरह इसे बुना। इस सवाल से लगातार जूझता रहा हूँ और इस पल, बिलकुल अभी लग रहा है कि यह हमारे अंदर से बाहर की ओर जाती हुई रेखा है, जिसका हमारे बिना कोई अस्तित्व नहीं है। भले उन संवेदनाओं के सघन होते क्षणों में मेरे मन के अंदर कोई ख़याल दाखिल हो जाये पर जबतक वह अंदर नहीं उतरता, तबतक कुछ भी नहीं लिख पाता। जब जब ऐसी हालत में लिखने की सोचता हूँ तो उसका सतहीपन साफ़ दिख जाता है। इस तरह कहीं-न-कहीं लगता है, हम लिखने से पहले उन सभी पंक्तियों को दोहराते हुए ऐसी जगह पहुँच जाते हैं, जहाँ उन्हे अंदर संभाले रखना मुश्किल होता होगा। जैसे इन सारी बातों का मेरे अलावे किसी और के लिए कोई मतलब नहीं है, वह किसी भी हृदय को किसी भी जगह चुने में सक्षम नहीं हैं। बीते इतने सालों में यहाँ लिखते हुए इस 'मेनरिज़्म' को तो पहचान ही लिया है, जो लिखने को एक ख़ास तरह के साँचे में ढाल देता है। हम भी इससे कहाँ बच पाये। लेकिन बाकी अभी नहीं। बाकी 'तद्भव' के अंक इकतीस के संपादकीय और जलसा के दो हज़ार पंद्रह के संस्करण 'आवाज़ें' के सिलसिले में जल्द।

{क्या सोच कर लिखने बैठा था, क्या सब लिखा गया। दोनों के बीच संगति बन नहीं पा रही। फ़िर सोचता हूँ, खराब भी लिखते रहना चाहिए। बात करनी थी, लिखने से पहले मन में चलने वाली प्रक्रिया  पर। चलो कोई नहीं। आप तस्वीर बड़ी करके उसे समझ सकते हैं। बाकी फ़िर कभी। }

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