नवंबर 13, 2015

लिखने के दरमियान

एक बात साफ़ तौर पर अपने अंदर दिखने लगी है। शायद कई बार उसे कह भी चुका हूँ। शब्द भले वही नहीं रहते हों पर हम अपनी ज़िंदगी के भीतर से ही कहने की शैली इज़ाद करते हैं। वह जितना हमारे भीतर से आएगी, उनती सघनता से वह दूसरों को महसूस भी होगी। इसे हम एक तरह की कसौटी भी मान सकते हैं या अपने अपने अनुभवों की सीमा। यह भी उतना बड़ा सच है कि हम सारी ज़िंदगी एक खाँचे में नहीं बिता सकते। हमारे इर्दगिर्द बनने बिगड़ने वाली परिस्थितियाँ उन तंतुओं, स्पंदनों, स्पर्शों के अर्थ को लगातार नए-नए रूप एवं अर्थ से भरते रहते हैं। कल आसमान में चंद्रमा नहीं था, दो दिन बाद उतना अँधेरा भी वहाँ नहीं रहेगा। सब परिवर्तनशील है। कुछ भी वैसा का वैसा नहीं रहेगा। तभी पीछे पलटकर देखने पर हम खुद को बदले हुए नज़र आते हैं। अगर कुछ बदलाव नहीं दिख रहा, तब हमें सचेत हो जाना चाहिए।

अक्सर पीछे मुड़कर देखते हुए लगता है, उस दरमियान से इस बीतते क्षण के बीच, एक बारीक-सी रेखा है, जो हमारे इन दोनों रूपों को जोड़ तो रही है, साथ ही, बहुत महीन से धागे बराबर हम वहाँ से खिसक आए हैं। जैसे जब हमने लिखना शुरू किया, तब, एक दबाव बाहर से अंदर की तरफ़ हमेशा महसूस होता था। हम जहाँ से खड़े होकर देख रहे थे, वहाँ से दुनिया तो दिखायी दे रही थी पर हमने ख़ुद के लिए उन मौकों को स्थगित रखा। इसे और सरल करके कहा जाये तो हम अपने भीतर उस समाज को पर्याप्त जगह देते हुए, समाज में अपनी भूमिका को निर्धारित कर रहे थे। उसमें चेतना का बहिर्गमन तो था, पर संवेदना का अंतस कहीं अनुपस्थित था। इसका इस तरह गायब होना, हमारे गुम हो जाने की पहली याद है।

लेकिन आज या उस वक़्त को धीरे-धीरे अपने पास से गुजरते हुए देखता हूँ तो लगता है, वह धारा बिलकुल परिवर्तित हो चुकी है। जिसे हम मज़ाक-मज़ाक में उमर का दबाव कहा करते थे, जिसे हमने मुक्तिबोध से उधार लेकर बोलना सीखा था, आज वही आत्मालोचन थोड़ा पर्दे के पीछे छिपकर सब देख रहा है, पर हम पर हावी नहीं हो पा रहा। इधर दिमाग ने भी ख़ुद से खेलने में निपुणता प्राप्त कर ली है। व्यक्ति के रूप में अब हमारे भीतर अस्तित्व के सवाल, अपना रूपाकार बदलकर आत्मकेन्द्रित हो चुके हैं। वह हमसे शुरू होकर हम तक वापस आकर दम तोड़ देते हैं। मैं ख़ुद को उन संवेदनाओं के अतिरेकी क्षणों से घिरा पाता हूँ, जहाँ समाज की सबसे छोटी इकाई, परिवार, मेरे मन को नियंत्रित कर चुका है।

अब यहाँ से चीज़ें थोड़ा खुलने लगती हैं कि आशीष लिखने की इच्छा से भर जाने के बाद भी क्यों नहीं लिख पाता। घर, पत्नी, नौकरी के सवालों के बीच हमारा रोजाना इस तरह हमारे मन को बुनता है, जहाँ रोज़ दोहराई गयी बातों से मन एकदम सुन्न होकर, किसी कोने में खड़ा, सबकुछ देखने के अलावा कुछ और नहीं कर पाता। सारी मानसिक ऊर्जा मन को यह समझाने में व्यतीत हो जाती है कि एक रात सपने में सोने के बाद, अगली ऐसी सुबह भी आएगी, जहाँ यह सवाल, सवाल नहीं रह जाएंगे। इनके जवाब हमारे बोलने से पहले ही हवा में तैरने लगेंगे। वह ख़ुशबू बनकर फैलने लगेंगे।

लेकिन इसमें मैं कहाँ हूँ। मैं एक तिलिस्म रचते हुए, उन सबकी एवज़ में यहाँ छत वाले कमरे में बहुत से ज़रूरी कामों को दूसरों पर टालते हुए, अनमना होकर, अपने भविष्य के अँधेरे को देखते हुए दुखी होने के बाद, यहाँ लैपटॉप खोलकर उन सबकी ज़िंदगियों को उतारने की फ़र्ज़ी-सी कोशिश में ख़ुद को झोंक देता हूँ। इस कमरे से बाहर निकलने पर मेरा दम घुटने लगता है। लगने लगता है, यह खिड़की जहाँ भी जाऊँगा, मेरे साथ नहीं आ पाएगी। तब, मैं इस खिड़की के आरपार नहीं देख पाऊँगा। इस खिड़की को देखते रहने के लिए बाहर निकलने से बचने लगा हूँ। यह एकतरह से पागलपन की निशानी है। जिससे बच पाना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा है। जैसे अभी, बिलकुल इसी क्षण, जब सब सो रहे हैं, इधर मैं इतनी रात जागकर लिख रहा हूँ।

लेकिन यह भी कैसे हो गया के पिछली दो पोस्टों से जहाँ पहुँचना चाहता हूँ, वहाँ नहीं पहुँच पा रहा। पता नहीं मन कैसे उन चीज़ों को उरतने नहीं दे रहा। पर मैं भी जिद्दी हूँ, इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ने वाला। पर वह क्या है, जो जैसे मेरे अंदर हैं, उन्हे वैसे भी नहीं कह पा रहा। फ़िर वह कौन लोग हैं, जो कहते हैं, चीजों को हू बहू उतार देना सबसे आसान काम है। पता नहीं। शायद उनके लिए आसान रहा होगा। मेरे लिए आसान कभी नहीं रहा। जैसे हम भले उस कमरे में बरसों से रह रहे हों, पर वही कमरा, जब मेरे मन के अंदर बन गयी छवि-सा बाहर आने की कोशिश करेगा, तब कुछ ऐसा होगा, जो मैं चाहकर भी कह नहीं पाऊँगा। शायद उस दरवाज़े की कोई चिटकनी छिपी रह जाएगी। वह हवा जिसे इतना सहज होकर रोज़ अपने आसपास महसूस करता होऊंगा, वह वहीं पलंग के पास, रसोई के अंदर, रोटी की परत में बैठ जाएगी। पानी की बूँद का नल से टपकना, हवा से पर्दे का ख़ास तरह से उड़ना। उन मोटे-मोटे चींटों का जबतब काट लेना नहीं कह पाऊँगा। सब वहीं का वहीं रह जाएगा।  तब मैं ठीक से एक नक़लनवीस भी नहीं बन पाऊँगा।

{साल भर पहले का पन्ना : मन की बातदूसरा पन्ना इसी साल का है : बातें बे-वज़ह }

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