नवंबर 28, 2015

चुप घर

इन दीवारों के बीच रहते-रहते वह इतना बड़ा हो गया कि घर में होता तो कभी बाहर निकलने के एहसास से नहीं भर पाता। वह चुप रहकर इन दीवारों को सुनने की कोशिश करता। तब उसे एक धुन सुनाई देती। धीमे-धीमे। आहिस्ता-आहिस्ता। जिधर से वह आवाज़ आती, वह उस तरफ़ अपनी थाली घुमा लेता। प्यास लगती पर पानी का गिलास नहीं उठाता। ऐसा करते हुए, वह अपने अंदर लौटने लगता। उसे लगता, जैसे उस मुलायम रेत की ठंडक, उसके रोवों में बिजली की तरह उतरने लगी हो। एक अजीब-सी नमी उसकी साँसों में होती। इस ख़याल में वह अपनी पत्नी के स्पर्श को पाता। वह समझ नहीं पाता, इन सालों में उसकी माता के हाथों की छुअन कहाँ गुम हो गयी? वह ख़ुद कहाँ गुम हो गया।

इस ख़याल के मन में आने के एक पल के भीतर उसकी पलकें वहीं थम जाती। वह पलकें उठाकर दोबारा देखने की कोशिश करता। कोशिश हमेशा हारने वाले करते थे। वह भी हमेशा से हारता आया था। इसलिए कोशिश करते हुए वह थक जाता। उसकी आँखें सोचती, यह तस्वीर हमारी ज़िंदगी का धागा है। एक अनसुनी कविता जैसे। हमसब इस बड़ी-सी दुनिया में खोये हुए, इसके भीतर रहकर, असाध्य वीणा की तरह इसे समझने में लगे हुए हैं।

आपके लिए यकीन करना मुश्किल होगा। सबके लिए होता है। उसने अपने मन में यह सोचा और नीचे रखे कागज़ पर लिखने लगा। वह डायरी में हमेशा ऐसी बातें लिख लिया करता। वह इधर सब भूलने लगा था। पर आज इतना सोचकर वह लिखने लगा, तब उसकी आँखें धुँधली होकर सोचने लगी। इस सामने टंगी घड़ी को देख फ़िर देखने लगता है। वक़्त वही हो रहा है, जो उन्होंने बताया था। वह बस अभी आने वाले होंगे। तब क्या होगा।

हुआ बस इतना, जब पार साल जब अम्मा ने उसकी लिखने वाली किताब कबाड़ी को बेच दी, तब उसका बड़ा लड़का एक कागज कर लिखा हुआ एक पुर्ज़ा ले आया था। उस पर कुछ ख़ास नहीं लिखा था। बस उसे भेजने वाला चाहता था, वह अब लिखना बंद कर दे। उसे ऐसी बातें कतई नहीं लिखनी चाहिए। वरना सब जान जाएँगे, हमारे यहाँ आज भी ऐसे घर हैं, जो कहीं ज़िन्दगी की किताबों में दर्ज़ हो रहे हैं। जहाँ लोग सिर्फ़ जीते नहीं, उसे ख़ून की तरह अपने अंदर महसूस करते हैं। यहाँ लोग, लोग नहीं, जोंक होते हैं। पर उसे पता है वह जोंक नहीं, इस घर की दीमक है।

बस इसका फैसला होना अभी बाकी है, वह घर को दीमक की तरह खा रहा है या घर उसे।  

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