नवंबर 15, 2015

शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या

ड्राफ़्ट में देखा तो तारीख़ आठ मार्च दो हज़ार तेरह की है। उसके साल भर पहले, आठ मार्च के दिनशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या  लिखी थी, तभी समझ गया था, स्त्री-पुरुष दोनों एकसाथ चलते हुए किसी भी निर्मिति को बनाते हैं। भले हम उसके अलग-अलग पाठ बनाते जाएँ, पर वह एक-दूसरे के पूरक के रूप में उभरने लगेंगे। आप एक सिरा पकड़ेंगे तो उसका दूसरा कोना, उस दूसरे तक अपने आप ले जाएगा, जिसे हम छोड़ना चाह रहे थे। हम चाहते हुए भी उससे बच नहीं सकते। बचना, एक किस्म का पूर्वाग्रह होगा। लेकिन दिलचस्प यह देखना है कि उस साल के भीतर एक नहीं दोबार अलग-अलग ड्राफ़्ट डैशबोर्ड में मिले। ऐसा क्या था, जो तब मन में चल रहा होगा? कौन-सी बातें छूटी लग रही होंगी, जो कहने के बावजूद कहने में दिख नहीं पाई वहाँ। वह ड्राफ़्ट इस वाले से भी तेरह महीने पहले का है। उसमें कोई तस्वीर नहीं लगाई है। वहाँ इस पुरुष व्याख्या करने की ज़िद इस दृष्टि के बनने से पहले की है।

उसमें सिमोन के हवाले से कुछ बातें हैं। वह कुछ इस तरह शुरू होता है। 'ऐसा नहीं है कि शहर की स्त्री व्याख्या में पुरुष नेपथ्य में है, उसकी भी उतनी ही हिस्सेदारी है, जितनी उसकी पत्नी की। सिमोन कहती हैं, स्त्री का जन्म नहीं होता, उसे बनाया जाता है, तो उसी क्रम में पुरुषसत्ता पुरुष को पुरुष की पूर्वनिर्धारित भूमिका में ढ़ालती है। इस वाक्य की छाया से थोड़ी देर के लिए निकल आया जाये तो हो सकता है कुछ और भी दिखे'। इसके बाद क्या हुआ होगा? कोई अंदाज़ा नहीं लग रहा। जादा से जादा दिमाग वापस उस पोस्ट को नए सिरे से पढ़ने लौट गया होगा और कुछ न समझ आने के बाद, इसे वहीं छोड़ दिया होगा। इतने दिनों बाद वापस लौटना संभव नहीं है। न इसका कोई रफ़ ड्राफ़्ट किसी पन्ने पर होने की कोई उम्मीद है। बस अभी थोड़ी देर उन सवालों को यहाँ स्थगित रखना है, जिससे हमारे दिमाग में वह इस स्थापना को भंग कर दे। थोड़ा मुश्किल है। पर करना पड़ेगा।

इस दरमियान हम दोबारा उस तार को कैसे पकड़ सकते हैं, इसके लिए एकबार फ़िर कोशिश करते हैं। जिसके लिए हम यह पूर्वधारणा पहले से लेकर चल रहे हैं कि पुरुषसत्ता पुरुषों को वैसा बनती है, जैसे वह हमें समाज में दिखते हैं। इसके बाद हमें करना बस इतना है कि एक ऐसे शहर की कल्पना करनी है, जहाँ स्त्रियाँ नहीं हैं। वह स्त्री शून्य क्षेत्र है। स्त्री, जिसे हम उसकी पत्नी के रूप में पिछली पोस्ट में रेखांकित कर चुके है। ऐसा करना मुश्किल लग रहा है, तो ज़रा अपने अनुभव के गलियारे में थोड़ी सैर करके जल्दी से वापस लौट आइए और उन जगहों, पेशों की स्मृतियों को फ़िर से बुनने की कोशिश करिए, जहाँ केवल पुरुष ही थे। चलिये आप भी क्या याद करेंगे। थोड़ा आपका काम मैंने नीचे कर दिया है। आपका दिमाग तो पहले ही बंद था।

वह गोल मार्केट में ' वैष्णो ढाबा' चलाने वाले पुरुष हैं। बेयर्ड लेन में 'हिमालय हैयर कटिंग सैलॉन' में बाल काटने वाले आदमी हैं। पहाड़गंज मेन बाज़ार में जितनी भी दुकानें हैं, उनमें कोई भी स्त्री के अधिपत्य में नहीं है। आजादपुर सब्ज़ीमंडी में सारे अढ़ाती, सारे सब्ज़ी बेचने वाले वाले मर्द हैं। इतवार दरियागंज में लगने वाला किताब बाज़ार पुरुषों की आर्थिकी का सृजन करता है। हमारे समाज के गेट पर दो शिफ़्टों में बदलने वाले गार्ड इतने सालों से आज तक पुरुष ही हैं। ठेका देसी शराब पर महिलाओं का पाया जाना गधे के सिर पर सींघ ढूँढ़ने जैसा है। खारी बावली, सदर बाज़ार, चाँदनी चौक, गाँधी नगर सब जगह बेलदारी करने वाले ठेले खींचने वाले कौन हैं? आपको नहीं पता नेहरू बाज़ार में ठेले पर फल बेचने से लेकर अवंतिका में स्कूल से सौ गज़ की दूरी पर जूस की दुकान से भी महिलाएँ अनुपस्थित हैं। पालिका प्लेस की फर्नीचर मार्केट में भी कील ठोकने से लेकर कुर्सी मेज़ रंगने वाले सब पुरुष हैं। भजनपुरा, कापासहेड़ा, मुनिरका, ढक्का, कोटला मुबारकपुर लेबर चौक किनसे अटे पड़े हैं। रीगल बिल्डिंग में पिंड बलूची के दरवाज़े पर पुतला भी बैठा रहता है, वह किसी पंजाबी पुरुष का प्रोटोटाइप है। कभी सुबह जल्दी उठकर अख़बार डालने वाले को देखा है। वह भी उस मदर डेरी पर बैठे आदमी जैसा दिखता है न। शिवाजी स्टेडियम के गिरिराज बुक स्टाल वाले। उस पीपल के पेड़ के नीचे वाले शनि मंदिर में पंडीजी भी तो अकेले रहते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह किसी ‘पुरुष गणराज्य’ की परिकल्पना है, जिसे आगे सिद्ध किया जाएगा। इन सीमित उदाहरणों से केवल यह देखने और चिन्हित करने की कोशिश है कि जिसे हमारे समाज में हम 'निम्न वर्ग' कह जाता है, क्या उसकी कोई पहचान उभर रही है? क्या यहाँ पुरुष बड़ी सहजता से स्त्रियोचित कार्य बड़ी सरलता से करते नज़र नहीं आ रहे? साथ ही यह भी देखने लायक है कि कहीं ऐसा तो नहीं है के छोटी पूँजी या जिन पेशों में स्थायित्व नहीं है, उनका संबंध 'विस्थापन' से तो नहीं जुड़ रहा? यदि ऐसा है, तब यह विस्थापन का पहला दौर है, जिसमें कमाने के लिए पुरुष घर से निकला है। यह विवेचन अब 'निम्न वर्ग की पुरुष व्याख्या' जैसा कुछ लगने लगे, तब भी हम कुछ नहीं कर सकते। उसकी जटिल संरचना ऐसी ही है।

अब यहाँ इस बिन्दु पर इस पूरे परिदृश्य को और समस्याग्रस्त करने की बारी आती है। जिसमें सबसे बड़ा सवाल उभरता है, क्या शहर का मूल निवासी यह 'विस्थापित' ही है, जो यहाँ थोड़े पैसे कमाने और उनसे अपनी ज़िंदगी को जिंदा रखने की जद्दोजहद में रोज़ पिसता हुआ मर रहा है। उसने अपना परिवार शहर की परिधि से बहुत दूर किसी अजाने से गाँव में झोपड़ी या छप्पर के नीचे रख छोड़ा है। जिससे वह हर शाम खाना खाने के बाद, फोन से बात करने के लिए बेचैन हो उठता है। माँ से बहन से, दो-दो बच्चों को पैदा करने वाली अपनी बीवी से। सबको कुछ-न-कुछ लाने के सच्चे झूठे वादे करके, थोड़ी-सी शराब पीकर उन सपनों में खो जाता है। तीज-त्योहार में रेलगाड़ी में भूसा बन, जादा समान पर घूस देकर कुछ दिन के लिए शहर के किस्सों के साथ, अपने घर लौट जाता है। वह इस बार पूरे छह साल बाद अकेले नहीं लौट रहा। बीवी बच्चों के साथ आ रहा है। वह सोच रहा है, इससे यहाँ खाने की समस्या तो खत्म हो जाएगी, उससे जो पैसा बचेगा, वह बच्चों की पढ़ाई में खर्च कर देगा। इस बहाने शहर में थोड़ा घर भी आ जाएगा।

{तीन साल पहले लिखी इसकी पहली कड़ी : शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या }

4 टिप्‍पणियां:

  1. सच लिखा है बहुत .......क्या शहर का मूल निवासी यह 'विस्थापित' ही है, जो यहाँ थोड़े पैसे कमाने और उनसे अपनी ज़िंदगी को जिंदा रखने की जद्दोजहद में रोज़ पिसता हुआ मर रहा है।

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    1. उसमें जो बातें रह गयी हैं, जिस विस्थापन की स्थापना सही अर्थ के साथ नहीं हो पायी थी, उसे और खोल कर कहने की कोशिश की है, आज शाम की पोस्ट में। आप देखिएगा, कुछ जुड़ भी रहा है या नहीं।

      लिंक: http://karnichaparkaran.blogspot.in/2015/11/misplaced-ourselves-in-the-construct-of-cities.html

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  2. ज़रूर पढूंगी, संघर्ष और दर्द दोनों महसूस होता है "शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या" में।

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