नवंबर 14, 2015

कैसे..

मैं लिखना चाहता हूँ वह शब्द, जो आज से पहले कभी किसी ने न लिखे हों। वह एहसास जो किसी ने न महसूस किए हों। कहीं से भी ढूँढ़ना पड़े, उन्हे खोजकर ले आऊँगा। उन्हें ढूँढ़ने में कितना भी वक़्त बीत जाए, पर वह मिल जाएँ, एकबार। कभी मन करता है, बस ऐसे ही उनकी तरह गुम होते रहना ठीक रहेगा। गुम होना भी ज़रूरी है। अपने अंदर से लेकर बाहर तक सब गुम होते-होते ऐसे गायब हो जाएगा, जैसे पहले कोई गुम नहीं हुआ। मुझे पता है, मैं गुम नहीं हो पाऊँगा। न कभी कुछ ऐसा कहीं किसी की चोर ज़ेब से चुरा पाऊँगा। पर कहने में क्या, कह देता हूँ। कभी एक दुनिया ऐसी बनाऊँगा, जहाँ सबकी चोर ज़ेब उनकी नज़रों में कभी नज़र ही नहीं आ पाएगी। तब चुपके से जो-जो समान वहाँ रखा होगा, उसमें से उन सबको ले आऊँगा। तब उन गुम हो गयी चीजों को कोई कहीं देख नहीं पाएगा। मैं उन्हे बड़ी हिफाज़त से अपने अंदर घुलने दूँगा। जैसे रंगरेज़ घुलने देता है, कपड़े डालने से पहले रंग। पर क्या करूँगा ऐसी दुनिया बनाकर, जो पहले किसी ने न देखी हो। पता नहीं ख़ुद पहचान पाऊँगा उसे या ऐसे ही सपने बुन रहा हूँ।

कभी सोचता हूँ, पर पता नहीं ठठेर गिलास कैसे बनाते होंगे। उन्हें ढालते वक़्त कौन से औज़ार काम आते होंगे। दिमाग उस वक़्त क्या कर रहा होता होगा? शायद वह पहले देखे किसी गिलास की नकल करने या कुछ मौलिक रचने की ज़िद से भर जाता होगा। सच पूछता हूँ, कभी गिलास को अकेले, खाली वक़्त में ध्यान से देखा है? एक बार देखना। बहुत ध्यान से देखना। वह पहला इंसान, कितनी रचनात्मक ऊर्जा से भरा होगा, जिसने पानी भरने के लिए बाल्टी जैसी चीज़ बनाने के बाद, गिलास बनाया होगा। उसने रस्सी से कुआँ खाली करने की ज़ुर्रत की होगी। क्या ऐसा सच में हुआ होगा के रस्सी, लोटा, गिलास, बाल्टी, घड़ा, थरिया, बटुली, चिम्मच, दसपना सब उसी आग के पास बैठे लोहार के दिमाग में एकदम उपज गए होंगे?

नहीं न। सच में ऐसा कभी नहीं हुआ होगा। हम धीरे-धीरे तालाबों में नहाते हुए कुओं के स्थापत्य को जान पाये होंगे। कच्ची बावड़ी से सीता बावड़ी तक। मैं भी आहिस्ते-आहिस्ते उन तक पहुँच जाऊँगा। पहुँचना नहीं ज़रूरी है, ज़रूरी है इस तरह से गुज़रते रहना। इस एकएक कदम के नीचे, मिट्टी की नमी में केंचुओं की तरह दबे शब्दों को धरती की चोर ज़ेब से निकालकर, आम की गुठलियों के साथ खुरपे से गाढ़ दूँगा। वह जब इस अगहन के महीने में रातरानी के फूलों में तब्दील हो जाएँगे, तब धीरे से तोड़ लूँगा। फ़िर आहिस्ते से उन्हें हाथ में रखकर वापस सबकी अलगनी पर टंगी कमीज़ों, पेटीकोटों, तहमदों में छिपा दूँगा। छिपा दूँगा सिक्कों के गुल्लकों में। उनके बिस्तर की रुई में। रज़ाई के खोल में। वह उन फूलों की ख़ुशबू से जान जायेंगे, कभी कोई उनके घर में चुपके से उस खुली खिड़की से अंदर आया था। वक़्त वही था, जब पति-पत्नी नंगे होकर एक-दूसरे को देख रहे थे। रात के डेढ़ बजे से कुछ पहले।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...