नवंबर 24, 2015

मन, मौसम, पेड़, बेखयाली और चिट्ठी..

कहीं कोई होगा, जो इस मौसम की ठंडक को अपने अंदर उतरने दे रहा होगा। कोई न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर होते हुए खुद को कोस रहा होगा। दुनिया में इन दो तरह के लोगों के अलावे भी कई और शैदाई होंगे, जो उन सड़कों, गलियों, अनदिखे मोड़ों पर रुककर, किसी अनजाने एहसास का इंतज़ार कर रहे होंगे। मेरे लिए यह खुद को कमरे के अंदर बंद कर लेने वाली शामें हैं। अँधेरा होते ही सब दिख रही चीज़ें जब छिपने लगती हैं। मैं भी उस ढलते सूरज के साथ यहाँ आकर चुपके से बैठ जाता हूँ। वह मेरे पीछे न जाने कहाँ-कहाँ घूमकर कल फ़िर आ जाएगा। इस तरह वह मेरे साथ खेलता है। मन में सोचता हूँ, हम किसी को नहीं बताते, हमें कैसा लग रहा है। पर कोई-कोई होता है, जो सब जान रहा होता है। तुम्हारे बाद यह मेरा मन है, जो सब जान जाता है। तुमसे कहने का ख़ूब मन किया करता है, पर ख़ुद से बात करने का जी नहीं होता। मन होता है, बस तुम्हें देखता जाऊँ, अपने अंदर। इस सबके दौरान, पता नहीं कुछ है, जो छूट रहा है लगता। दिन का रात में ढलना और वहाँ तुम्हारा न होना जैसे। जैसे कितने मन से उस किताब को सिराहने रखकर भूल जाना। प्यास का लगना और गिलास पास न होना।

हम कभी-कभी कितने तरह से किसी को अपनी बात कह देने के बाद भी खाली नहीं होते। कभी कुछ न कह कर भी खाली हो जाते हैं। वह पेड़ जो सामने वाले बागीचे में हमारे बचपन से खड़ा है, अब कुछ नहीं कहता। चुपचाप खड़े-खड़े उसने कितना वक़्त गुज़ार दिया। कभी कहीं नहीं गया। इन ठंडियों में भी वह कोहरे में छिप जाएगा। तब हमें लगेगा, वह कहीं चला गया। पर नहीं। वह वहीं खड़ा, हमें सुन रहा होगा। सब कह रहे हैं, यह जगह रहने लायक नहीं रही। हवा भी हवा की तरह न होकर कुछ और बनती जा रही है। कोई तुमसे क्यों नहीं पूछता। तुम तो सबसे बेहतर तरीके से उन्हें समझा सकते हो न। समझा सकते हो न? तुम्हें लगे न लगे, पर मैं तुम पर ऐसे ही विश्वास करता रहूँगा। ऐसा करते हुए, तुम मेरे अंदर उग आए पेड़ बन जाओगे। पेड़ उगने के लिए ज़रूरी है, मिट्टी बन जाना। मैं धीरे-धीरे मिट्टी बन रहा हूँ। हम सब धीरे-धीरे ऐसे होते जाएँगे। कोई पहले, कोई बाद में। मेरे अंदर भी यह जड़ें जम रही हैं। मैं भी एक जीवन को अपने अंदर पलते हुए देखना चाहता हूँ। जिसे मैं अपना कह सकूँ। कहने में एक सुनना भी है। मैं यही सुनना चाहता हूँ।

इन बेतरतीब बातों के बीच जो एक लकीर मेरे दिल की आकृति को बना रही है, उसकी धमनियों में गुज़रता हुई रक्ताभ किरण से ख़ुद को बुनते हुए एक पश्मीने की शाल बनाऊँगा। अम्मा को इस ठंड में उनके चारों तरफ़ इससे घेर दूंगा। उनके इन सालों में कठोर हो गए हाथों में इन मुलायम धागों का स्पर्श, उन्हें कश्मीर से आती जनवरी की ठंड में छिपा ले जाएगा। तुम्हारे लिए तनचोई के रेशम से बने कागज़ पर तुम्हें ख़त लिखुंगा। लिखुंगा वह सारी बातें, जो तुमसे तुम्हारे कान के पास आकर कहूँगा। तुम्हारे साथ वहीं बैठ जाऊंगा। घास पर गिरती सीत, अपनी बाहों पर गिरते देख हम भी अपने अंदर लौट आयेंगे। चप्पल में लग गयी घास की ख़ुशबू में हमारी देह की गंध, परछाईं बनकर, वहीं रह जाएगी। फ़िर, जब कोई अनदेखा वहाँ लौटेगे, तब हमारे कदमों को पढ़कर, उस चिट्ठी को समझ जाएगा। चिट्ठी, जिसमें कहीं कोई शब्द नहीं था। कुछ गंध थी, कुछ घास के सूखे तिनके थे, कुछ हमारी पसीने की बूंदें थीं। वह सूख भी जाएँगी, तब भी हम दिखते रहेंगे। वहीं उसी पेड़ के नीचे, पश्मीने की शाल में लिपटे। अम्मा के साथ। हम सब, सपने में आज रात लखनऊ मेल पकड़कर गाँव जा रहे हैं। पापा ऑटो रुकवा रहे हैं। भाई, बहन के साथ वहीं आती जाती गाड़ियों के धुएँ को देखते हुए, तुमसे बात कर रहे हैं पेड़।

6 टिप्‍पणियां:

  1. शब्दों का तिलिस्म बना रहे कि इन्हीं से खूबसूरत है ज़िन्दगी...कई बार लोग कहीं जाते नहीं. ठहर जाते हैं. उसी मोड़ पर. उसी वक्त में !!

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    1. तिलिस्म भी हमारे लिखने की ओट में की जा रही राजनीति है। जिंदा रहने, जिंदा रहने लायक बने रहने की राजनीति।

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरुवार, कल 3 दिसंबर 2015 को में शामिल किया गया है।
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमत्रित है ......धन्यवाद !

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  3. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

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