नवंबर 21, 2015

शहर की आदत में हमारी जगह

उसमें बहुत सारी चीज़ें या तो अपने आप गुम हो गई हैं या गुम कर दी गयी हैं। चीजों का न दिखना अकसर हमें ऐसा ही करता जाता है। लगता है, ऐसा बहुत कुछ था जो दिख नहीं रहा, उसे कौन कहेगा। मैंने ऐसा जान बूझकर नहीं किया। कभी हो जाता हो, तो पता नहीं। इसने कहीं से भी शहर को ढक नहीं लिया है। शहर  इससे भी जादा कहीं बाहर छूट गया होगा। हमसे भी तो कभी-कभी एक बार में सबकुछ कहा भी तो नहीं जाता। कहने का सहूर आए या न आए, इसकी तमीज़ आते-आते आती है। हम कितना कुछ रोज़ देखते रहते हैं। कभी कुछ नहीं कहते। बस उसका गुजरते रहना आदत बनकर रह जाता है।

वह इतनी सारी लड़कियाँ जो यहाँ पीजी में अकेले रह रही हैं। वह कंपनियों की अनुबंधित गाड़ियों से गली के एक ख़ास मोड़ पर उतरकर, उन खिड़कियों से अंदर झाँकते हुए सीढ़ियाँ चढ़ते वक़्त, अपने पापा को याद करती सारी थकान भूल जाती हैं। और चट से अम्मा को फ़ोन करके पापा की दवाई की यादी दिलाती हुई ताला खोलने लगती हैं। वह सब लड़के जो किसी सपने की गिरफ़्त में उनकी तरह यहाँ अपने परिवारों से दूर चार बाई आठ के कमरे में क्रिसश्चन कॉलोनी में पड़े रहते हैं। खाना बनाते हुए चाची के हाथ की घुइए की सब्ज़ी याद करते हुए, उनके बनाए कटहल के अचार को खाते-खाते कहीं किसी और ही दुनिया में चले जाते हैं। जहाँ सब है। वह सीढ़ियों पर ख़ास अंदाज़ से चलने वाली आवाज़ वाली लड़की भी।

यह विस्थापन  इस शहर की निर्मिति में इस कदर जुड़ गया है कि किसी भी चीज़ के इसके बाहर होने की संभावना कम ही लगती है। हम सब कभी-न-कभी, किसी-न-किसी वक़्त अपनी असल कही जा रही जगह पर कहीं और से चलकर ही पहुँचे होंगे। ‘कहना’ चूँकि ‘मान लेना’ है और यह ‘मान लेना’ हमारे सामने ‘घटित’ नहीं होता इसलिए हम बचपन से रह रही जगह को स्थायी मानकर आसान-सी ज़िंदगी जी रहे होते हैं। जबकि ऐसा है नहीं। हम लगातार जगहों को अपने लिए बुन रहे होते हैं। इस क्रम में या तो जगहों को अपने मुताबिक ढाल रहे होते हैं या उनकी तरह ढल रहे होते हैं। या जितनी सरल प्रक्रिया दिखती है, उससे जटिल इसे एकबार में समझ लेना है। कोई यह भी कह सकता है, हम इतिहास की एक तारीख़ को पहले जगह को ढाल रहे थे, और अब यह ढाल पाना हमारे बस में नहीं रहा, इसलिए ढल रहे हैं। एक आग है, जो काँच को चूड़ियों में बदल रही है।

ऐसा करते हुए इस प्रक्रिया की समाजशास्त्रीय व्याख्या में जो-जो सत्ता के केंद्र बनकर उभरे होंगे, हम उनकी भूमिकाओं को हम सिरे से नज़रअंदाज़ करते चल रहे हैं। क्या हमसब वक़्त के किसी दौर में जब यह सभ्यता या समाज अपने निर्माण के प्रारम्भिक दौर में रहा होगा, तब क्या ऐसा हो सकता है कि हम सब स्वयं में इतने शक्तिशाली रहे होंगे कि उन निर्मितियों में हमारे द्वारा सुझाए गए कार्यों, ढांचों, सिद्धांतों, प्रारूपों, विधियों को इस समाज की गतिकी में स्थान मिल पाया होगा? इसे समझने की ज़रूरत है और हमें इसके लिए गिलोय का काढ़ा नहीं पीना है और न ही कपालभांती प्राणायाम करने का अभ्यास करना होगा। इसके लिए आप अपने आसपास देखिये। इस समाज को समझने की कोशिश कीजिये। बहुत आसान है समझना।

वह रिक्शे वाला  जो हमें चूनामंडी पहाड़गंज की गलियों से होता हुआ, अपनी पैरगाड़ी पर बिठाकर, पिंडलियों की नसों के खिंच जाने की हद से वापस लौटते हुए आधा किलोमीटर दूर, रामकृष्ण आश्रम मार्ग लाया है। क्या हमने उसे उतने ही रुपये(?) देना बड़ी आसानी से मान लिया था, जितना उसने हमसे पहली मर्तबा माँगा था? हम ऐसा कभी किसी रिक्शे वाले को अपने साथ करने नहीं देते हैं। लेकिन अभी रिक्शे से उतरकर, जब कुछ कदम चलकर हम मेट्रो स्टेशन में दाख़िल होंगे, तब क्या होगा? यहाँ दो तरह से किराया लिया जाएगा। एक, यहाँ लाइन में लगकर टोकन लेना पड़ता है या दूसरा, स्मार्ट कार्ड से एएफ़सी गेट पर अपने आप निर्धारित राशि कट जाती है। क्या कभी हमने सोचा है, एक जगह हम अपनी मनमर्ज़ी चलाने, धौंस जमाने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते। वही दूसरी तरफ़ बड़े-बड़े फ़न्ने खाँ स्टेशन में दाखिल होते ही किसी भी प्रकार की बहस या मोल भाव करने के खयाल से नहीं भर जाते। यह विरोधाभासी परिवर्तन इतनी सहजता हमारे अंदर घटित हो जाता है। हमें पता भी चलता होगा, तो हम छिपा ले जाते हैं।

कभी सोच कर देखिएगा? ऐसा क्यों हुआ? हमारे इतिहास में ऐसी कौन-सी घटना घटी होगी, जिसके परिणामस्वरूप, हम एक स्थान विशेष की परिधि में आते ही अपने अंदर यह गुणात्मक परिवर्तन देखने लग जाते हैं। यहविस्थापन है। जिस अर्थ में आप देख रहे हैं, वैसा तो यह बिलकुल नहीं है। ऐसा कहकर इस पूरी व्याख्या को संकुचित नहीं करना चाहता, पर यहाँ खत्म करते हुए इतना ज़रूर कहूँगा कि यह विस्थापन कहीं इतिहास में घटित हुआ है, जिसे हम आज भौतिक रूप में अपने चारो तरफ़ घिरा पाते हैं। यह अँग्रेजी का ‘माइग्रेशन’ नहीं, ‘डिसपोज़ीशन’ है। यह मनुष्य के इतिहास में ऐसा अध्याय है, जिसमें हम सब कहीं बाहर खदेड़ दिये गए हैं। यह मानवीय संवेदनाओं का सामाजिक रूप से स्खलन दर्शाता है। हमने अपने ऊपर एक ऐसा तंत्र हावी होने दिया है, जिसमें हमें मनुष्यों से जादा उसके द्वारा बनाई गयी संस्थाओं पर विश्वास है। इसे हम सिर्फ़ मनुष्यों की जगह संस्थाओं के आ जाने की बात कहकर समझ जाएँगे, नहीं। यही वह क्षण था, जब हमने ख़ुद को इतिहास में अपनी निर्धारित जगह से ख़ुद को धकेल दिया। जो जगह मनुष्यों द्वारा भरी जानी थी, वहाँ भी उसने ख़ुद को उसकी ओट में रख लेना ठीक समझा। ऐसा करके हमने एक पदानुक्रम स्थापित कर लिया है।

{इस पूरे विश्लेषण को हम सिर्फ़ पिछली पोस्ट के साथ जोड़कर ही नहीं, बल्कि अपने सामाजिक ढाँचे, उसके अंदर के हर एक रेशे को समझने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। अब दिमाग है, तो उसका इतना चलना तो बनता है। अगर नहीं चला सकते तो, वह किसी काम का नहीं। }

2 टिप्‍पणियां:

  1. यहविस्थापन है। जिस अर्थ में आप देख रहे हैं, वैसा तो यह बिलकुल नहीं है। ऐसा कहकर इस पूरी व्याख्या को संकुचित नहीं करना चाहता..........बार-बार यही सब दोहराया जाएगा फिर स्पस्टीकरण दिए जाएंगे की आपको चीजों को समझने की क्षमता नहीं है।

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    1. यहाँ (इस ब्लॉग में) 'समझना' कभी इकहरा नहीं रहा, चूंकि यह बातें 'किसी विशेष' द्वारा (और यह विशेष यहाँ मैं हूँ) कही जा रही है, और उसके मन में एक विचार है, तो सबसे पहले तो वही अपनी बात को रखेगा। इसके बाहर, जो कि इसे पढ़ने वाले हैं, वह किसी भी तरह से इसकी व्याख्या करने और अर्थ लेने के लिए स्वतंत्र हैं। पर सबसे पहले उन्हे मेरे या उस कहने वाले विशेष का अर्थ तो जानना ही पड़ेगा। कि उसका अर्ग्युमेंट क्या है। उसका थीसिस क्या कह रहा है।

      इसके अर्थ के बाहर, 'समझने' का कोई अर्थ नहीं है।

      हटाएं

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