नवंबर 21, 2015

तितली: मिथक टूटने की कथा

तितलियाँ तो रंग बिरंगी होती हैं। उड़ती हैं, फूलों पर नाचती हैं। उनके पराग कणों पर बैठती हैं। सबसे पहले यह फ़िल्म, इस नाम के मिथक को तोड़ती है। फ़िर एकएक कर सब चीज़ें टूटकर बिखरने लगती हैं। बिखरना नयी संरचनाओं के लिए सबसे अनिवार्य तत्व है। उनकी इस तितली का रंग गेंहुआ है। पर हमें इसका रंग, स्याह दिखता। वह उड़ नहीं पाती थी। वह छटपटा रही थी। वह जिस घर में थी, वहाँ उसका दम घुटता था। पहली बार लगा, कोई इतनी सहजता से भी हमारे इंसान न रहने की कहानी कह सकता है।

यह हमारे दौर की सबसे सशक्त फ़िल्मों में से एक है, जो इतनी बारीकी से इस तरल समय की तमाम जटिलताओं के रेशे-रेशे उधेड़ कर रख देती है। यह निर्ममता इस माध्यम में नहीं, हमारे देशकाल में है। जो लगातार हमारे अमानवीय होते जाने की कहानी को एक सरल रेखा की तरह खींच देती है। बताती है, हम किस रास्ते से ख़ुद को बर्बाद करके यहाँ तक पहुँचे हैं। यह उस वक़्त की कहानी भी है, जब हम विकास और प्रगति जैसे शब्दों में मकड़ी की तरह ख़ुद को उलझा हुआ पाते हैं और समझ नहीं पाते कि जो सामने दिख रहा है, उसे क्या समझें। इस परिदृश्य में, जबकि हम सोचने समझने के क़ाबिल नहीं छोड़े गए हैं, यह कोई छोटी बात नहीं है कि हम इन रूपों में देखकर जान सकते हैं के 'आधुनिकता' की प्रक्रिया ने हमारे साथ क्या किया है?

तितली घर का सबसे छोटा लड़का है। तीन भाइयों और एक पिता के साथ वह उस घर को बनाते हैं, जहाँ सबसे बड़े भाई की पत्नी, अब अपनी बेटी के साथ वहाँ नहीं रहती। फ़िल्म यहीं से शुरू होती है। उलझी हुई सी। बेटी का जन्मदिन है, फ़िर भी वह रात को वहाँ रुकने से मना करती है। वह कैसे भी करके छुटकी को साथ लेकर लौट जाती है। रात में ऐसा क्या है? यह रात थोड़ी देर बाद समझ आती है। रात चोरों की होती है और वह सब रात के चोर हैं। सुनसान सड़कों पर गाड़ी वालों को लूटते हैं। उनकी गाड़ी, फ़िर कभी गाड़ी की तरह सड़क पर नज़र नहीं आती। हमेशा के लिए गायब हो जाती।

यह अपने भीतर कई सारे सवालों को लेकर एकसाथ चलती है। वह इस घर से भागना चाहता है, चाहकर भी भाग नहीं पाता। उसका असफल हो जाना, हमारे सामने और बड़े मंज़र को खोलता है। हम देखते हैं, इस आधुनिक काल ने उसने केवल पितृसत्ता के साथ समझौता नहीं किया बल्कि उसके औज़ार और पैने किए हैं। उस मॉल में विक्रम जहाँ गार्ड की नौकरी करता है, वहाँ एक लड़की मुस्कुरा-मुस्कुरा कर एक पुरुष की दाढ़ी बना रही है। यह दृश्य जब टीवी सेटों से निकलकर उनकी ज़िंदगी का हिस्सा बनकर सामने आता है, तब इसके मानी बिलकुल बदल जाते हैं। मँझला भाई, इसे सिर्फ़ तितली को घर में रोकने की तरक़ीब नहीं बनाता, बल्कि अपने रात के काम को दिन में करने के लिए इस्तेमाल भी करता है। ऐसा करते हुए वह बिलकुल उसी लहज़े में सोचता है, जिस भाषा में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ बिक्री बढ़ाने के लिए स्त्री देह का प्रयोग करती हैं। उनका विज्ञापन अब नीलू करेगी।

नीलू। तितली की पत्नी। इस कैरेक्टर की एंट्री के साथ फ़िल्म एक दूसरे स्तर पर पहुँच जाती है। कनु बहल बड़ी कुशलता के साथ इस क्राफ़्ट से चीज़ों को सुलझाते हुए कहते चलते हैं, जहाँ हम बस देखते रह गए और हमारी नसों में बहता ख़ून, उसका एक-एक कतरा वहीं का वहीं थम गया। कार टेस्ट ड्राईव के लिए लेकर निकलना और उसके बाद उस वीभत्स रक्तरंजित दृश्य रचने की हिम्मत दिखाना, किसी बड़े विजन वाले डायरेक्टर की उपज है, यह दिखता है। सबसे हृदयविदारक दृश्य सिर्फ़ अनुराग कश्यप की 'पाँच' या 'गैंग्स् ऑफ वासेपुर' में नहीं हैं। जहाँ हत्या को 'ग्लोरीफ़ाय' करने के लिए उनका इस्तेमाल किया गया है। 'अग्ली' में जब गुम हुई बच्ची मिलती है, तब भी दिल इसतरह जुगुप्सा से नहीं भर पाता। सच में मन किया था, ऑडी थ्री से निकलकर बाहर घूम आऊँ थोड़ा। अगर समर और संदीप न होते तो बाहर चला भी जाता। वहाँ बैठे रहने की हिम्मत नहीं बची थी।

इस हिंसा को हम देख पाने में सक्षम हैं, जिसे परंपरा, ख़ून के लाल रंग के साथ संबंध जोड़कर हमें बताती आई है। लेकिन उसे क्या कहेंगे, जहाँ एक ऐसा वर्ग भी है, जो अपने स्वार्थ के लिए -या यह इस संदर्भ में बहुत छोटा शब्द बनकर रह गया है, जो उस सघनता से बात को नहीं कह पा रहा- दूसरे वर्ग के 'मन' को अपने कब्ज़े में ले लेता है। हमें हमेशा लगता रहेगा, हम जो कर रहे हैं, अपने लिए कर रहे हैं। पर असल में ऐसा होता नहीं है। वह वर्ग हमारे मन का उत्पीड़न करता है एवं उसका व्यवस्थापक बन जाता है। विक्रम और उसके दोनों भाई। उनसे से पहले उनके पिता। सत्ता के नियामक सब जानते हैं। फ़िर भी पुलिस कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करती। वह ऐसे प्रतीक रूप में उभरती है, जहाँ उसने इन्हे अपने लिए खड़ा किया है। एक गराज वाला है, जिसके लिए वह गाड़ी चुराते हैं, इनको बचाता है। फ़िर अपने बाक़ी के पैसे निकालने के लिए पुलिस अफ़सर इन्हें हवाला के पैसे लाने ले जाने वाले व्यक्ति का सुराग देता है और उसकी हत्या करके एक करोड़ रुपये लूटने की योजना इन्हे बताता है। उनके घर देसी कट्टा भेजता है।

लेकिन इतना होने पर अभी भी कोई है, जिस तक हम पहुँचे नहीं हैं। उसकी पहचान अभी भी छुपी हुई है। उसने सीधे तौर पर पूँजीवादी व्यवस्था के खोल के भीतर ख़ुद को समेट लिया है। पुलिस निजी पूँजी की संरक्षक है। वह कोई भी ऐसा काम नहीं करती, जिससे पूँजीपति की निजी संपत्ति को हानि हो। उसने हमारे अधकचरे विकासशील समाज के उस हिस्से को अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, जिसका इस प्रगति से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। वह इस धारा से छिटके हुए लोग हैं। वही लोग हमें इस फ़िल्म के मुख्य चरित्रों के रूप में दिखाई देते हैं। जमना पार, किसी गटर की पहचान वाली गली के एक मकान में रहने वाले। शहर की परिधि पर स्थित। पर वह कभी ख़ुद को ऐसा मानने के लिए तय्यार नहीं होता। उसे मानना पड़ेगा, उसने अपने अस्तित्व के लिए यह शहर और यह वर्ग बनाया है। इनके बिना उसका काम नहीं चल सकता।

साफ़ तौर पर यह नज़र आने लगता है उनका गाड़ी चुराना, लूटपाट करना, एक संकेत है। आज जबकि दिल्ली की सड़कों पर बारह सौ कारें रोज़ सड़कों पर उतार आती हो। उनके द्वारा हो रही पर्यावरण की क्षति को अर्थव्यवस्था, शहरीकरण और विकास जैसे शब्दों के जाल से ढक दिया जाता हो, तब भी क्या उनकी पहचान छिपी रह गयी है? बिलकुल नहीं। तितली मेरठ में जिस मॉल की पार्किंग के लिए तीन लाख रुपये इकट्ठा कर रहा है, वहाँ किनकी गाडियाँ खड़ी होंगी। उन आलीशान महँगी बड़ी-बड़ी दुकानों में, उन आलीशान कारों से ख़रीदारी करने कौन आएगा? अगर अभी भी समझ नहीं आया, तब उनके लिए यहाँ नीलू ऐसी लड़की के रूप में उभरती है, जो शादी की पहली रात अपने पति को ऐसा कुछ भी करने नहीं देती, जिसकी कल्पना हमारे मन आजतक हम दूध के गिलास और हाथ के दूरी पर रखे टेबल लैंप बुझने के साथ करने लगता है। आप पायेंगे, यह लड़की कुछ अलग है। वह ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतों को बनाने वाले बिल्डर के शादीशुदा बेटे के साथ प्यार में हैं। वह नाम से ही प्रिंस नहीं है, सच में उसका राजकुमार है, जिसके कहने पर वह तितली से शादी करने के लिए राजी हो जाती है। यह वही सुविधाभोगी उच्च वर्ग है, जो बहुमंजिला इमारतों में, ग्रेटर कैलाश, हौज़ खास, साउथ एक्स की बड़ी-बड़ी कोठियों में रह रहा है। नवीनतम तकनीक का उपभोग कर रहा है। उसने अपने लिए ऐसे तंत्र और तबके को खड़ा कर लिया है, जिसके पीछे वह छिपकर कुछ भी कर सकता है। इससे उसकी पहचान ही मुश्किल नहीं हुई है, उसतक पहुँचना भी उतना कठिन है। वह एकसाथ, इतने विरोधाभासों के बीच होने के बावज़ूद, ख़ुद को 'आधुनिक' कहने की सुविधा का उपयोग करता रहा है। उसे पहचान कर भी हम उसे रोक नहीं पा रहे। यही हमारी हार है।

अब तक थोड़ा अंदाज़ तो आपको भी हो गया होगा, जो फिल्म एक-एक फ्रेम में इतनी बारीकी से चीजों को रच रही हो, उसे देखे बिना कुछ ख़ास समझ में नहीं आने वाला। लिखने वाले पर भी यह दबाव हमेशा रहता है कि पढ़ने के बाद भी, यह 'देखना' बचा रह जाये। बहरहाल। वापस लौटते हैं। सच में, यह फ़िल्म, इस छोटी-सी सुविधाजनक व्याख्या में नहीं सामने वाली। इसका फ़लक इससे बहुत बड़ा है। यहाँ हमें यह भी चिन्हित करना पड़ेगा कि इस दरमियान हमारे भीतर क्या-क्या टूट रहा है और उससे क्या बनकर सामने आया? यह हमारे शहरों, उनमें दिखने वाले प्रगति सूचकों के पीछे की कहानी है। थोड़ी असहज, खुरदरी, उलझी हुई। एक पंक्ति में यह हमारे अमानवीय होते जाने की कथा है। इसका हर दृश्य इतनी सघनता से अपनी बात कहता जाता और उसके घटित होने पर कुछ सोचते, उससे पहले हमारा दिमाग एकदम सुन्न होने लगता। जैसे-जैसे हम साँस लेने में असहज होते गए, वैसे-वैसे तितली हमारे साथ साँस लेता रहा। फ़िक्र मत कीजिये, अभी भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे देखे बिना दिल नहीं मानेगा। इस फ़िल्म को बनाने के लिए जितनी हिम्मत चाहिए, उससे कहीं जादा हिम्मत, इसे देखने के लिए चाहिए। अगर आप थोड़े हिम्मती किस्म के हैं तो आप फ़िल्म देख सकते हैं।

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