नवंबर 16, 2015

हमारी अधूरी कहानी..

इस हिस्से की कहानी उसकी है। अगर उसमें भी मैं हूँ, तब यह मेरी भी उतनी ही होगी, जितनी उसकी। कभी उसने यह 'याद शहर' वाले नीलेश मिसरा को नहीं भेजी। कभी वह भेज नहीं पाया। अक्सर हम ऐसे ही होते हैं। अधूरे। अनकहे। छिपे हुए से। पर वह अभी-अभी मेरे मन के ख़यालों से गुजरते हुए दिल में कहीं चुभ गयी। उसने कहीं अपने मन में यह बात रख ली। वह अब कभी किसी से प्यार नहीं करेगा। वह भी तब, जबकि प्यार हम करते नहीं, वो नामुराद ख़ुद ब ख़ुद हो जाता है। हम तय कहाँ कर पाते हैं। तय करने वाले प्यार नहीं कुछ और करते होंगे। शायद उसे लगा होगा वह तय कर रहा है, क्योंकि वह लड़का है। लड़कियाँ तय कहाँ कर पाती हैं। उन्हे तो बस उससे प्यार करने के लिए ख़ुद को बनाना होता है। पता नहीं यह कैसा था। अधपका। अधकचरा। अधखिला। आप इश्क़ में हैं, यह पता चल जाने के बाद जिसके साथ अपनी आगे वाली ज़िन्दगी देख रहे हैं, उसे बताने से पहले अभी थोड़ा और उखड़ेना पड़ेगा। परतें मिट्टी के तालाब में सूखने के बाद कैसे पपड़ी बन जाती हैं, बिलकुल वैसे ही किसी सतह पर उसे वह यादें सपने बनकर सतायेंगी। चुभेंगी हर पल उन ख़ास लम्हों की बातें।

{ पिछली किश्तें हमारी अधूरी कहानी : एक दो }

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