नवंबर 22, 2015

ये दाग़-दाग़ अँधेरा, ये शब-गज़ीदा शहर

हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ हम ख़ुद नहीं जानते कि यह दौर हमारे साथ क्या कर रहा है। यह पंक्ति, अपने पाठक से बहुत संवेदना और सहनशीलता की माँग करती है कि वह आगे आने वाली बातों को भी उतनी गंभीरता से अपने अंदर सहेजता जाये। जब हम, किसी दिन अपनी ज़िन्दगी, इसी शहर में बिता डालने की सोचने लगते हैं, तब अपने साथ किस तरह की सहानुभूति चाहते हैं? हम दरअसल वह मौकापरस्त हैं, जो शहर में टिके रहने के बहाने बनाने लगा है। हम जिन जगहों को छोड़कर यहाँ आए हैं, उनके बारे में कभी सोचते हैं तो दिल भर आता है, आँखें ढलते सूरज की तरह डूब जाती हैं। ऐसा करके हम थोड़े रूआँसा हो आते हैं, थोड़ा रो लेते हैं। पर थोड़ी देर का ख़ुमार, थोड़ी देर में उतर जाता है।

उपरोक्त क्रिया करके हम यह समझते हैं, उस छोड़ आई जगह से अभी तक कितने प्यार से भरे हुए हैं और आगे भी भरे रह सकते हैं। लेकिन, असल में यह प्यार हमारी कमज़ोरियों को छिपा लेजाने का बहाना है। हम कभी उन जगहों पर वापस लौटकर, उन्हें रहने लायक बनाने की हिम्मत से भर नहीं पाये। इस तंत्र ने हमें हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी का एहसास दिलाया है, हम कितने कमज़ोर हैं। हम कुछ भी करने लायक नहीं बचे हैं। पर क्या इतनी भी हिम्मत नहीं बची कि हम उस जगह को कोई नाम दे सकें। आपके हिस्से में पड़ने वाला नाम कुछ और हो सकता है, हमारे हिस्से यह हमारे बाबा-दादी का गाँव है। गाँव, जहाँ से कभी हमारे पिता पढ़ने के लिए निकले थे और आज, वह हमारे लिए शहर में रह रहे हैं। हम भी इस दुनिया के कमज़ोर लोगों की तरह कमज़ोर हैं, पर थोड़ा सोचने समझने लगे हैं। यही सोचना समझना सबसे बड़ी दिक्कत बनकर उभरने लगा है।

जब हम देखते हैं, अपनी जमीन को बचाने, उसे आपे मन मुताबिक इस्तेमाल करने की इच्छा से भरे रहने का यहाँ कोई मूल्य नहीं है। चूंकि आप अपनी जमीन को आततायी सत्ता से बचाने के लिए आंदोलन करते हैं, तब विकास विरोधी बताकर हाशिये पर डालने की साजिशें की जाती हैं। हर किसी को विकास का इकहरा अर्थ समझाया जाता है। जहाँ बड़ी-बड़ी अमानवीय मशीनों से गुज़रे बिना विकास संभव ही नहीं है, तब यह प्रक्रिया समाप्त होने पर कितनी अमानवीय व्यवस्था को जन्म देगी, इसका अंदाज़ा कोई नहीं लगाना चाहता। सत्ता संचालकों के चेहरे बदल जाते हैं, पर उनकी नीतियाँ वही रहती हैं। वह इस देश के लिए जिसे विकास कहकर थाली में सजा रहे हैं, उसमें सबसे अधिक नुकसान यहाँ के लोगों का हुआ है। हम अपने लोगों के लिए नहीं, उन बड़े बड़े प्रतिष्ठानों के लिए अपने संसाधन, पूँजी, प्रकृति, हवा, पर्यावरण, पर्यावास सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तय्यार हैं।

जबतक हमारी यह मनोवृत्ति नहीं बदलेगी, हम अपनी जमीन के लिए संघर्ष करने वालों को नक्सली कहकर मारते रहेंगे। तब-तब कोई मेधा पाटकर, अरुंधति रॉय उनकी आवाज़ को दुनिया के सामने चीख़-चीख़ कर कहती रहेंगी, पर हमारी आँखों के सामने अँधेरा छाया रहेगा और कानों पर जूं का रेंगना स्थगित रहेगा। हमें वह सपने देखने होंगे, जो आज तक हमने नहीं देखे हैं। उनमें ख़ुद को महसूस करते जाने की हद तक डूबते जाना है। हमें हिम्मत से भरना होगा। पर अगर आप इन उबाऊ, निरर्थक बातों से आए दिन परेशान रहने लगे हैं और यह सब आपको बेकार के  प्रोपेगंडा लगते हैं, तब आपको जितना जल्दी हो सके कनु बहल की भारत में हाल ही में प्रदर्शित फ़िल्म, 'तितली' देखनी चाहिए। वह आपको आपकी भाषा में बताएगी, इन विकास, प्रगति, शहर जैसे बड़े-बड़े शब्दों ने हमारे साथ क्या किया है। यह शहर असल में हमें अपना उपनिवेश बनाते हैं, और कुछ नहीं। 

{शीर्षक, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म 'ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर ' से माफ़ी के साथ, यह पिछली किश्त: शहर की आदत में हमारी जगह और उससे पहले की कड़ी: शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या  पर इधर आखिरी हिस्सा..}

1 टिप्पणी:

  1. मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है। बोलना ज़रूरी है कभी ख़ामोशी भी अपराध होती है।

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