नवंबर 11, 2015

इस दिवाली, शैलेश मटियानी की याद

मेरी बस थोड़ी-सी आँखें जल रही हैं और थोड़ी-सी नींद गायब है। बाकी सब ठीक है, जैसे देश में सब ठीक है। इस व्यंजना को समझने के लिए जादा दिमाग लगाने और घोड़े दौड़ाने की ज़रूरत नहीं है। यह कोई फ़िलर पोस्ट नहीं है जो इतने दिन के बाद आज रात उस खाली स्थान को भरने की गरज से लिखी जा रही है। लिखने का जो मज़ा स्याही से है, वह इस कीबोर्ड में नहीं है। यह बात दावा नहीं, मेरे हिस्से का अनुभव है। इस पिछले हफ़्ते जब यहाँ नहीं लौट पाया, कागज़ पर चहलकदमी कर रहा था। वह जगह हमेशा से अपनी तरफ़ खींचती-सी है। पास बुलाती। सब कुछ अपने अंदर छिपा लेती। उसे मेरे अलावे कोई नहीं पढ़ता। सिर्फ़ तुम्हें छोड़कर। 

थोड़ा पढ़ने की तरफ़ भी लौट गया, इन दिनों। शैलेश मटियानी की इलाहाबाद से प्रकाशित किताब है, त्रिज्या। जिल्द तीन खंडों में विभाजित है। संस्मरण, लेख, कहानी। मुझसे किताब राकेश की तरह बेतरतीब नहीं पढ़ी जाती। पहले उसे पढ़ने की कोशिश करता हूँ, जो पहले है। शुरू के पन्नों पर उनके बचपन के दिन बिखरे पड़े हैं। और बिखरी पड़ी हैं पहाड़ों की स्मृतियाँ। ढलते हुए सूरज का घाटी में डूब जाना। जैसे उनका दिल हर शाम डूब जाता हो। उनके घर में न पिता बचे, न माता। कोई नहीं है। मृत्यु परछाईं की तरह उनके साथ हरदम मौजूद है जैसे। वह उसे महसूस ही नहीं करते, हम भी उसे पहचानते चलते हैं। उनकी स्कूल की पढ़ाई बीच में छूट जाती है। और यहीं राजेश जोशी की कविता दाख़िल होते हुए नज़र आती है। बच्‍चे काम पर जा रहे हैं।

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्‍चे, काम पर जा रहे हैं/ सुबह-सुबह/ बच्‍चे काम पर जा रहे हैं/ हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह/ भयानक है, इसे विवरण के तरह लिखा जाना/ लिखा जाना चाहिए इसे, सवाल की तरह/ काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?

शैलेश भेड़े चराते और सुबह-शाम बच्चों को स्कूल जाते और वहाँ से लौटते हुए ललचाई आँखों से देखा करते। उनका पढ़ जाना एक संयोग ही था। वह पढ़ने के बाद उस अनुभव को कहते हैं। उन यादों को कभी भूलते नहीं हैं। पहाड़ हमेशा जिजीविषा का प्रतीक बनकर उभरता। पर उनके संस्मरण में पता नहीं कौन-सी भाषिक जटिलता प्रवेश कर गयी कि पढ़ना पढ़ने की तरह नहीं रह पाया। वह मेरे दिमाग की अबूझ कसरत बन गया। आख़िरकार हारकर किताब एक दिन चुपचाप वापस कर आया। पर पता लग गया हमारे भाषा के संस्कार कितने कमज़ोर हैं। मुझे सीधे-सीधे उनकी और अपनी भाषा के बीच वक़्त का ऐसा दौर गायब मिला, जिसमें हम उनके द्वारा प्रयोग किए गए शब्दों से उछलकर एक अलग तरह की भाषा में ख़ुद को पाते हैं। न वाक्य संरचना के खाँचे मिल पाये, न उनकी गरिष्ठ भाषा समझ में आई। लगता रहा, पता नहीं क्यों इसे उन्होने ओढ़ लिया होगा?

जाने दीजिये, अगर बात समझ नहीं आ रही। पर बात अभी भी ख़त्म नहीं हुई है। यह हमारी कमज़ोरी है, जो शब्दों के अर्थों को अपने अंदर उगने नहीं देते। वह कौन से दबाव रहे होंगे, जो भाषा को शैलेश इस कदर जटिल बनाकर अपने मन की परतों को उघाड़ रहे थे? इसे सहज नहीं कहा जा सकता। बचपन उन्हें असहज बनाता हुआ, उनके पूरे अस्तित्व को झकझोर रहा होगा। कैसे वह उन टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर दोबारा चलकर ख़ुद को तड़पता हुआ देख, उस कमरे के खालीपन से दोबारा भर गए होंगे। वह अर्धांगिनी  और मैमूद  जैसी कहानियों के लेखक हैं। राजेन्द्र यादव कहते हैं, उन्हें सारी जिन्दगी जितना मिलना था, नहीं मिला  पता है, अपने अंतिम दिनों में वह ख़ुद भी नहीं जानते थे, वह एक लेखक हैं। इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी, हम ख़ुद भी याद न रख पाएँ, हम कौन हैं। त्रिज्या का वह हिस्सा भी ख़ुद को भूल जाने से पहले, ख़ुद को याद करने की छोटी-सी कोशिश रहा होगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. किसी किताब से जब हम सम्पर्क नहीं जोड़ पाते तो उसे छोड़ना पड़ता है। जटिल भाषा चीज़ों को और जटिल कर देती है। दीवाली की शुभकामनाएँ

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    1. पता नहीं यह भावनात्मक जुड़ने के लिए किताबों को भाषा की ज़रूरत क्यों पड़ती है। शायद यही उनकी सीमा है, वरना कहीं कहीं तो इस सघनता से वह अपनी बात कहते हैं, कि आप चाह कर भी नहीं छूट पाते।

      बहरहाल, आपको भी हार्दिक शुभकामनायें।

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