दिसंबर 15, 2015

लिखने से पहले..

दुनिया कितनी बड़ी है। इसके बीतते एक एक पल में इतनी सारी चीज़ें एक साथ घटित हो रही हैं, जिन्हें कह पाने की क्षमता मुझ अकेले में नहीं है। लिख तो तब पाऊँ जब उनतक मेरी पहुँच हो। दरअसल यह बात मुझे मेरी औकात बताने के वास्ते है। मैं कोई इतना दिलचस्प या गंभीर लेखक या अध्येता नहीं हूँ कि हर गुज़रते एहसाह को कह पाऊँ। जो लिख लेते हैं और ऐसे दावों से घिरे रहते हैं, वह कोई और लोग होंगे। मुझसे ऐसा झूठ नहीं बोला जाता। क्योंकि इतना सब एक साथ महसूस करने की अपनी हैसियत नहीं। एक छोटा सा दिल है, उसी से परेशान रहता हूँ। सबकी कहने लायक भाषा भी तो नहीं मेरे पास। थोड़ा बहुत जो कह पाया हूँ उसी में इतने छेद हैं कि न पैबंद लगाने लायक सामान जुटा पाया न उस पयेजामे को पहनकर बाहर घूम सका।

जितना भी आज तक लिखा है और आगे भी कहने की कोशिश करूंगा, उनमें से एक-एक बात मुझसे होकर गुज़रेगी। मेरी आँखों से देखी दुनिया। कहीं कोई इस बात पर अड़ न जाये इसलिए पहले कहे देता हूँ, ऐसे होने से ही यह व्यक्तिनिष्ठता को अपने अंदर गुथे हुई है। कोई बाद में यह न कहे, हमारी दुनिया इससे काफ़ी अलग दिखती है। ज़रूर उनकी दुनिया के रंग इस दुनिया से अलग होंगे। वह सारे क्षण उनके यहाँ किसी और तरह से गुज़र रहे होंगे। मैं तो बस उन्ही पेड़ों, सड़कों, लड़कियों, अम्मा-बाबा की बात कहने की कोशिश कर रहा हूँ। मेरा दिल जो धड़क रहा है, उसकी धड़कनों में एक तुम रहती हो। एक मेरी छोटी-सी बहन है, एक मेरा थोड़ा मुझसे छोटा भाई है। इतनी सी दुनिया में सबको समेटने की ज़िद से भरा हुआ अगर कोई कुछ कहने की कोशिश कर रहा है, तब उसे कुछ पहले अपनी कह लेने दो। उसके भी कुछ सपने हैं। वह भी कहीं किसी पीपर के पेड़ पर बैताल की तरह किसी डार पर सपने के साथ अरझा हुआ-सा रह गया है। इस दुनिया में यह एक कमरा हमारे नाम का भी है। इसे तो अपने मन से बनाऊँगा।

आज यह सारी बातें किसी की नज़र में कुछ नहीं हैं। सबसे पहले इनका अपनी नज़र में कुछ होना ज़रूरी है। और अपनी नज़र में एक ठीक-ठाक ‘मिडीयॉकर’ मेरे भीतर घुसपैठ कर चुका है। इतना ही मेरे लिए काफ़ी है। कुछ अपने जैसे लोगों की ख़ोज में लगे रहने का मन है। मैं सोचता हूँ, मैं ऐसा ही ठीक हूँ। कोई न जाने, यह भी एक सुविधा है। पर ऐसा सोचकर कि किसी के न जानने से आप किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं, यह सबसे बड़ा छलावा है। हम शायद तब अपने आप को किसी परत से नहीं ढकते। हमें तब किसी बड़ी बात को कहने के लिए बड़े-बड़े शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं कुछ न कहते हुई भी काफ़ी कुछ कह देता हूँ। जिनपर सिद्धांतकार बड़े-बड़े भारी भरकम बिम्ब रचते हैं, उनकी हवा निकालने के लिए एक चुभती हुई सूई की ज़रूरत है, और वह मेरे पास है। उसे बस उनके गुब्बारे में चुभाने की देर है। यह सारी बातें जो यहाँ ताखों में, सिकहर पर टंगी हैं, न दिखने वाली नुकीली सूई है।

{डायरी में कहीं.. पन्ना पता नहीं। }

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