दिसंबर 27, 2015

अलविदा से कुछ पहले..

कल पूरी रात करवट-करवट नींद में सवाल थे और नींद गायब थी। मन में दोहराता रहा, अब बस। अब और नहीं लिखा जाता। कोई कितना कह सकता है। सच, इन पाँच सालों में जितना भी कहा है, मेरी दुनिया को समझने की मुकम्मल नज़र दिख जाती है। मेरे पास बस इतना ही है, मुझे अब यह समझ लेना चाहिए। यहाँ मैं वही पिछले साल की बातें नहीं दोहराना चाहता। दोहराते हुए कोई कितना असहाय लगता है। मैं भी ऐसा होता गया हूँ। आलोक से कहा तो कहने लगा, मत जाओ। ऐसे बहुत हैं, जो यही बात अलग अलग तरह से कह रहे हैं। अभी जब देवेश से कहा। वह भी यही कहने लगा। पर इस बार यह भावुक निर्णय नहीं है। न अचानक इस तरफ़ पहुँच गया हूँ। कुछ फुरसत मुझे भी चाहिए। थी तब भी नहीं, पर तब से लेकर कुछ तो है जो बदला होगा मेरे अंदर।

यह कहते हुए भी कितना अजीब लग रहा है, यह ब्लॉग, करनी चापरकरन अब बंद होने जा रहा है। हमेशा के लिए। इस पर दोबारा आने का मन हुआ तो भी नहीं आएंगे। उसी के लिए तो इतनी चिट्ठियाँ यहाँ टाँगे जा रहे हैं कि उनसे कोई एक साथ गुज़र नहीं सकता। लेकिन जाने से पहले कुछ जवाबों को देना और उन्हे जवाबों की तरह न कहना ज़रूरी है। इसलिए एक दो-पोस्ट इधर-उधर सब चलता है। पर साल ख़त्म होने से पहले इसे रोक देंगे। जब शुरू एक दिन हुए, तब एक दिन ख़त्म भी होंगे। ज़रूरी है एक दिन रुक जाना। थोड़ा बैठ कर पीछे देखना। ठहर कर देखना कहाँ से चले थे, कहाँ पहुँच गए।

2.
सबसे पहली बात तो यह कि ऐसा पता नहीं क्यों हुआ होगा कि मेरा लिखा इतना अमूर्त होता गया जिसमें कोई स्टैंड नहीं दिख रहा। शायद यह देखने वाले की नज़र का फ़ेर है, जो इनके पीछे उभरने वाली छवियों को देख पाने में असमर्थ हैं। उसका कहना है, जो कोई पक्ष नहीं लेते इतिहास और वक़्त उन्हें एक ख़ास खाँचे में बंद कर देता है। वह वही साँचा है, जिससे मेरी लड़ाई है। मुझे नहीं लगता उसने कहने से पहले जादा सोचा होगा। पर आज मैं ऐसी बात क्यों करने लगा। मुझे किसी से कोई प्रामाणिकता नहीं चाहिए। जैसा मैं हूँ, वैसा मुझे पता है। जो यहाँ आते रहे हैं, उन्हें भी थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा।

चलो छोड़ा। कुछ तात्कालिक दबाव भी होते होंगे, जो हमारे लिखने को इस तरह तोड़ते-मरोड़ते रहे होंगे। एक बार की बात है, हिन्दी ब्लॉग के दस साल हो जाने वाली मेरी पोस्ट पर लंदन से अनुराग शर्मा कुछ-कुछ नाराज़ हो गए। मैंने कुछ कह दिया था। उस शुरुवाती दौर में सब प्रवासी थे और वे सब इस ख़ास तकनीक तक पहुँचने में सक्षम रहे। उनके मनों में हिन्दी अपने दिलों में देश की सुगंध जैसी महक रही थी। वहीं मैंने उनकी टिप्पणी पर तल्ख़ होते हुए फ़िर जवाब दिया था शायद। पता नहीं उनका गुस्सा अब भी उतरा है या नहीं। तबसे उनसे बात नहीं हुई है। ऐसे ही एक समीर लाल की उड़नतश्तरी थी। जहाँ तक मैंने कभी पहुँचने की कोशिश नहीं की। काकेश की कतरन, लपुझन्ना, तानाबाना, अखाड़े का उदास मुगदर, मोहल्ला पता नहीं कितने और नाम मन में इधर उधर हुए जा रहे हैं। पता नहीं हिन्दी ब्लॉग अपने पाँच साल में ही कहाँ खो गया। यह वही वक़्त था, जब मैंने अपने लिए पाँच साल माँगे और यहाँ आ गया।

3.
वैसे यह बिलकुल वैसा ही था जैसे हम ढलते हुए सूरज को देखते रहें। पर महसूस इन गुजरते सालों में बहुत बाद में करते हुए ख़ुद डूब जाएँ। एक एक कर सब जाने लगे। सतीश पंचम का सफ़ेदघर मुझे अपने गाँव जैसा लगता। मैं भी सोचता कभी ऐसा हम भी लिखा करेंगे। पता नहीं यहाँ कभी ऐसा कर भी पाया के नहीं। मसिजीवी एक कल्ट ब्लॉग था। पर विजेन्द्र की लद्दाख वाली पोस्ट में उनका लगाया पिकासा का एलबम कहीं यादों में टंका रह गया। वह उतरा ही नहीं। उदय प्रकाश भी ख़ूब लिखा करते। यह हमारे पढ़ पढ़कर सीखने के दिन रहे। उन्हीं दिनों अपने मन में मैंने सागर से शर्त लगाई। तुम्हारी तरह हम भी लिखकर रहेंगे। अब जबकि वह भी यहाँ से गायब हैं, यहाँ रुके रहने का मन नहीं होता। एक पूजा बची। जो बैंगलोर में भी दिल्ली, देवघर, पटने की याद को लेकर बैठी हुई है। तुम्हारी किताब बढ़िया है पूजा संदीप तुम्हारा नाम कई बार लेता है। अच्छालिखती हो तुम।प्रमोद सिंह अब चुप हैं। रवि रतलामी से हम तब मिले, जब वे रतलामी में से श्रीवास्तव हो गए और उन्होंने लिखने के लिए आदम हौवे की ओट ले ली। उन्होंने ओट क्या ली, लिखना ही छोड़ दिया।

अनूप शुक्ल जी का फ़ुरसतिया इसके तो कहने ही क्या। कानपुर से अब उसी जबलपुर की सरकारी फैक्ट्री में हैं, जहाँ किसी दौर में ओमप्रकाश वाल्मीकि रहे थे। ज्ञानरंजन से लेकर पता नहीं किन-किन से मिलते रहे। अब जबकि अनूप जी की पुलहिया किताब आ चुकी है, उन्हें ऐसी और किताबों के लिए अग्रिम शुभकामनायें देते हुए लौट जाने को हूँ। इसी साल जनवरी में कानपुर जाने से पहले बात हुई थी। उसपर पोस्ट ड्राफ़्ट में पड़ी रह गयी। पूरब का कलकत्ता है कानपुर

ऐसे ही इसी सालसागर का एक शनिवार दफ़्तर से निकलते हुए फ़ोन आया। पहले तो नंबर नया था इसलिए पहचान नहीं पाया, फ़िर उसकी ब्लॉग पर लगाई  राजेन्द्र यादव की किताब 'मुड़-मुड़ के देखता हूँ' की ऑडिओ क्लिप से तुरंत मिलान कर आवाज़ पहचान गया। सागर ही थे। पता नहीं ऑफिस शायद निज़ामुद्दीन ईस्ट या वेस्ट में था। और रहते शायद भोगल में हैं। अपनी रानीजान के साथ। कितना कहा, पर तुम माने नहीं। लिखने के लिए साथ की ज़रूरत होती है। तुम नहीं लौटे इसलिए अब मैं ही लौट रहा हूँ। जैसे चार साल पहले आलोक और मैंने एक साथ फ़ेसबुक के लिए लिखना कम कर दिया था और हम यहाँ आ गए थे। अब मैं यहाँ से जा रहा हूँ। बस कुछ यादें बेतरतीब आए जा रही हैं, उन्हें कहने का मन है। और कुछ नहीं।

4.
यह ब्लॉग भी अजीब जगह है। हर वक़्त दिल पर हावी। मन कहीं लगता ही नहीं हो जैसे। कहते हैं, ऐसी हालत में कहीं आते-जाते नहीं। पर मैंने सोच लिया है, यहाँ से अब चलने का वक़्त आ गया है। सही वक़्त पर न करो तो काम रह जाते हैं। समझ तो हम बहुत पहले गए थे, पर थोड़े जिद्दी थे। लेकिन लगता है, अब ज़िद काम नहीं कर रही। उसने साथ छोड़ दिया है। अधूरी बातों की तरह इसे भी यही छोड़ देंगे। जैसे कल रात एक और पोस्ट जुड़ गयी और इस तरह कुल जमा रफ़ ड्राफ़्ट हुए सत्तासी। किन्ही में तस्वीरें लगी हैं, कुछ में दस-दस बीस-बीस लाइनें। कई मज़मून ऐसे ही डायरी में पड़े रह गए हैं। उन्हें ऐसे ही रख देंगे। छुएंगे भी नहीं। क्या करेंगे कहकर। बहुत कह लिया। अब चुप रहकर सुनने का वक़्त है। सुनने का भी अपना मज़ा है। हम भी कभी इन दिनों को यादकर कभी कहेंगे, एक दौर वह भी था, जब हम भी यहाँ लिखा करते थे। इसने भी हमें नक्कारखाने में कुछ हैसियत दी थी।

लेकिन यहाँ से जा रहा हूँ, तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरी सारी क्षमताओं को मैंने उसकी अधिकतम सीमाओं तक लेजाकर छोड़ दिया। यहाँ रहता तो होता कुछ और। पर सच में इस नाम की छवियों ने अंदर तक तोड़ कर रख दिया है। और इतना लिखकर यह लग रहा है, बीती उनतीस दिसंबर दो हज़ार चौदह को यही सब बातें आने से रह गयी होंगी, जिसके एवज़ में साल भर और गाड़ी चल गयी। वरना यहाँ से जाने का मन जितना तब था, उससे कुछ कम अभी महसूस कर रहा हूँ पर जाने के कारण ज्यों के त्यों बने हुए हैं। उनका होना मुझे लगातार तोड़ रहा है। जैसे कितनी ही बातों से इसने न जाने कितने ढाँचों, स्थापनाओं, विचारों, भावों, वृत्तियों, इच्छाओं को तोड़ा और उन्हें फ़िर से बुनते हुए सामने रखा। यह नाम अपने अंदर तोड़ने की जितनी क्षमताओं को रखता है और उसका जितना ताप मैं महसूस करता हूँ उसका एक सिरा भी कभी यहाँ नहीं कह पाया। जूझता रहा कहने के नाम पर। छटपटाता रहा। साँसें ऊपर नीचे होती रहीं। पर यह नामाकूल कहीं भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। इसलिए इसको तोड़ने का मन हो रहा है। इसको तोड़े बिना मैं ख़ुद को समेट नहीं सकता। हो सकता है, आपको मेरे मन की परतों की कोई थाह नहीं लग रही हो पर यह मेरे लिए किसी भी बनी बनाई संरचनों को तोड़ने वाले साधन के रूप में मिला था।

जिस दौर में यह मिला था, उस वक़्त हवा में भी कुछ इसी तरह की बातें तैर रही थी। लेकिन इतनी साफ़-साफ़ दिखती वजहों के भी अगर आप समझ नहीं पा रहे तब मैं यही कह सकता हूँ कि अब कागज़ पर लिखने का मन है। कागज़। जहाँ से हम शुरू हुए थे। जहाँ हमने लिखना सीखा था। ऐसा नहीं है यहाँ लिखना नहीं सीखा। लेकिन जितना कहा, उससे जादा उसे छिपाना सीखा। उसकी परछाईं से भी तो कभी-न-कभी निकलने की जरूरत होती है। सही वक़्त तभी होता है, जब आप समझ जाएँ। समझ समझ का फ़ेर है। शायद मैं समझ चुका हूँ। इसलिए जा रहा हूँ। जाना ज़रूरी है।

जाते-जाते सबसे ज़रूरी बात यह कि इसे किसी भी तरह से पलायन न समझा जाये। पलायन होता तो ऐसे कहकर नहीं जाता। चुपके से चला जाता। बताता भी नहीं। यह लिखना मेरे उन दिनों का दस्तावेज़ है, जब मैंने ख़ुद अपने आपको समेटकर कछुआ बना लिया था। कछुआ अपने मन से अपने अंगों को बाहर निकालता है। मैं भी सिमटकर एक कमरे में बंद हो गया। इस ब्लॉग ने मेरे अंदर एक खिड़की बनाई। जिससे मैं अपने अंदर झाँक सका। देख सका, वहाँ भी एक दिल धड़कता है। किसी को छूने, उससे बात करने इसके साथ कुछ दूर चलने की इच्छाएँ साँस लेती हैं। दिल अभी भी पुरज़ोर धड़क रहा है। वहाँ अब तुम हो। हमारे अनदेखे सपने हैं। तुम कहती हो मैं इसे नहीं छोड़ पाऊँगा। पर देखो आज मैं जा रहा हूँ। और तुम भी देख लो जो हम चुपके चुपके एक दूसरे के नाम बेनामी ख़त रख छोड़ा करते थे अब उसके लिए भी कोई बहाना नहीं छोड़ रहा। सिकहर पर यह लौटने से पहले की अलविदा है बस।

5.
जैसे जनसत्ता से हमारे छपने के दिन चले गए, अब अंदर से लिखने का मन नहीं हो रहा। लेकर भी तो इतना ही वक़्त लाया था। और सही सही हिसाब लगाऊँ तो वह पहली नौ पोस्ट तो एक बटन दब जाने से ऐसी गायब हुई थी कि आज तक हाथ नहीं लगीं। दिसंबर से दिसंबर। पूरे पाँच साल। अब चलते हैं। समांतर जुलाई एकतीस दो हज़ार पंद्रह को बंद हुआ। दिल टूट कर बिखर गया हो जैसे। पहली बार लगा जैसे हमारा घर कहीं चला गया। अब जहाँ हम छप सकते थे, वही जगह नहीं बची तब यह ब्लॉग बचकर क्या करेगा। आप सबको लग रहा होगा कैसी बचकानी बातें हैं। पर यह सच है। कुल जमा पंद्रह पोस्ट थीं जब हम जनसत्ता में पहली बार छपे थे। प्रभाष जोशी के कागद कारे वाला जनसत्ता। वह जनसत्ता जिसने हममें ताकत भरी। जिसके कारण हम लिखने की ताकत समझ सके। हम बिना किसी की पूंछ पकड़े वहाँ के संपादकीय पृष्ठ पर थे।

हम भी ख़ुद को कुछ समझने लगे थे। लगा था हम भी कह सकते हैं। पर सिर्फ़ जनसत्ता। हमने रवीश कुमार के हिंदुस्तान में छपने वाले कॉलम ‘ब्लॉग वार्ता’ के अवसान काल में लिखना शुरू किया। एक सेलेब्रिटी एंकर पत्रकार जिन जिन के ब्लॉग पर लिखता गया वह सब जैसे छाते रहे। आज अधिकतर ऐसे छाए हैं कि बंद छातों की तरह दरवाज़े के पीछे पड़े धूल खा रहे हैं। समझ में आने लगा यह पवार स्ट्रक्चर का खेल है सारा। वरना मेरे पास भी अनुराग वत्स की तरह नवभारत टाइम्स में नौकरी होती तो मेरा भी कोई सबद जैसा ब्लॉग होता। कुँवर नारायण की गद्द्य की किताब ‘रुख़’ का संपादन मैंने किया होता। गीत चतुर्वेदी की कवितायें मेरे ब्लॉग पर लगतीं। चन्दन पाण्डेय की कहानीरिवाल्वर  पीडीएफ़ में मैं शेयर करता।

मेरा वितान थोड़ा कम होता तब पाखी के अविनाश मिश्र  का उप-सम्पादन मेरी कलम कर रही होती। दिल्ली हिन्दी अकादमी की मैत्रेयी पुष्पा मुझे शायक आलोक और प्रांजल धर की तरह पन्द्रह मिनट के कविता पाठ के लिए दस हज़ार रुपये के मानदेय वाला लिफ़ाफ़ा बढ़ाते हुए शुभकामनाओं से लाद देतीं। वरना ऐसा क्या है, प्रवीण पाण्डेय की बोझिल, इकहरी, उबाऊ कविताओं में कि उनकी हर बर्बाद कविता पर टिप्पणी की बौछार होती रहती है। और हम ऐसा लिखते हैं, जो किसी की समझ में नहीं आता। इतना समझने पर भी समझ नहीं आता मामला क्या है? क्या मामला इतना ही है?

6.
यह क्या हो गया है मुझे? जो बातें आज तक नहीं लिखीं उन्हें आज कहने का कोई मतलब नहीं। पर फ़िर भी कहते हैं, जाते-जाते जो मन में हो, उसे कह देना चाहिए। अच्छा रहता है। मैं किसी तुलनात्मक अध्ययन में नहीं पड़ना चाहता। हो सकता है, यह ऊपर लिखे नाम किन्हीं असली व्यक्तियों के हों। पर इनके नाम भी यहीं हैं, इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता। जो तंत्र इस सारी गतिकी को नियंत्रित कर रहा है, उसमें दीमक इस कदर लग चुकी है कि भले उसके दरकने में अभी थोड़ा वक़्त हो पर एक दिन उसे ख़त्म होना ही पड़ेगा। नाम बदल जाएँगे पर तंत्र उन बदले हुए नामों को भी ऐसे ही खड़ा करता रहेगा। ज़रूरी नामों का नहीं, तंत्र के चरित्र के बदलने का है। यह जितनी भी जगहें ऐसे भरी हुई थीं, उनमें सेंध लगती हुई यह जगह अब चुक गयी है। इसलिए इसे बंद होना ही था। बंद होना विचार का मर जाना नहीं है। विचार तो यहाँ अमेरिका के इस गूगल के अन्तरिक्ष में कहीं टिकाये, समुद्र के नीचे बिछी तारों के जरिये किसी अनाम सी मशीन से जुड़े सर्वर में तब तक रहेंगी, जब तब वह चाहेंगे। क्योंकि मेरा ब्लॉग बंद करने का मन है, डिलीट करने का नहीं। जब तंत्र इस कदर दुरभिसंधियों से अटा पड़ा हो वहाँ हम जैसों का कोई काम नहीं। इसलिए हम अपने काम पर लौट रहे हैं। काम ज़रूरी है।

इससे जादा अब कहने का मन नहीं है। पर मुझे पता है, यहाँ से चले जाने के बाद किसी को कोई फरक नहीं पड़ेगा। जब मैं यहाँ था तब कौन सा पहाड़ रोज़ टूट रहा था जो मेरे यहाँ से चले जाने के बाद उसमें भूस्खलन की आवक में तीन गुना की वृद्धि होने जा रही है। जो मन में था, उसे वैसा ही कहने की कोशिश की है। बुरा लगा तब भी मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा। उनकी इतनी हैसियत नहीं कि कुछ भी कर सकें। वैसे सच कहूँ तो पाँच साल बाद इसे बंद करना ही था। अब थोड़ी किताबें पढ़नी हैं, थोड़ा कागज़ पर लिखना है और थोड़े बाकी रह गए काम पूरे करने हैं। वक़्त कहीं से तो निकालना था, निकाल लिया।

4 टिप्‍पणियां:

  1. अभी इस पोस्ट को दोबारा पढूंगा शचीन्द्र जी ...अभी सिर्फ इतना कि मैं भी चापाकारन के बहुत सारे प्रशंसकों में से एक हूँ ...

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    1. आप लोगों के सहारे ही तो लिख पाया। बस अब जाना है। बहुत काम पीछे रह गए हैं। जो बातें यहाँ नहीं थीं और उन्हीं के सहारे जा रहा हूँ इसलिए उन्तीस की रात वाली पोस्ट लगाई।

      आशा है आप समझेंगे।

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  2. कहीं नहीं जाओगे। समझे !

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    1. समझा करो सागर। अब जाने दो। पिछली बार भी तुमने कहा तो रुक गए। पर अपनी मोहलत तो ख़त्म हो गयी। पाँच साल मन में थे, ख़त्म। इस जगह का एक ख़ास दबाव काम करता है, मेरे मन पर सारे व्यक्तित्व पर। उसी में यह साल गुज़र गए।

      वैसे भी यहाँ से जा रहा हूँ, फ़िकर मत करो लिखना नहीं छोड़ रहा। हो सकता है, अभी कल ही कहीं कोई नया ठिकना बनाकर वहाँ शुरू हो जाऊँ।

      बाक़ी बातें का सिलसिला तो चलता रहेगा। उसे रुकने नहीं देंगे। तुम मिले और साथी मिले यही मेरे लिए बड़ी बात है।

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