दिसंबर 04, 2015

पता नहीं शहर हमारे साथ क्या कर रहे हैं

अभी जबसे सो कर उठा हूँ तब से पता नहीं किन अजीब-अजीब से ख़यालों से भर गया हूँ। कैसे इन विकृत से बेढंगे सवालों ने मुझे घेर लिया है। ऐसा क्यों होता है, हम न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर हो जाते हैं। कहाँ कमरे में अकेले खाली बैठा रहता। कुछ सोचता। सोचता शायद यही सब। या इससे भी जटिल। उलझा हुआ। या पता नहीं क्या। हम अपने माता-पिता के बाद पहली पीढ़ी हैं, जो शहर में उनके साथ रह रहे हैं। वह अपनी युवावस्था में यहाँ आए, हम बचपन से यहाँ है। पता नहीं उन परिवारों की कहानी क्या रही होगी, जो कभी कहीं से उठकर यहाँ चले आए होंगे। क्या वह कभी ऐसे भावों से नहीं भर गए होंगे। क्या उनके पास कभी यह भाव, आया भी होगा। हो सकता है, आया हो। यह आज मेरे पास है कल किसी और के पास होगा। सोच रहा हूँ, यह शहर हमारे साथ क्या कर रहे हैं?

यह कोई बहुत बड़ा सवाल नहीं है। फ़िर भी मेरे लिए यह एक ऐसी बात है, जिसमें कमरे के बाहर तैरते अँधेरे को अपने अंदर दबे पाँव दाखिल होता देख डर गया हूँ। हुआ कुछ नहीं। बस ऐसे ही रोने का मन करने लगा। हम यहाँ कर क्या रहे हैं? यह शहर हमारी कीमत पर ख़ुद को बनाए हुए हमारे ऊपर चल रहा है। आहिस्ते-आहिस्ते उसके चलने के निशान अब दिखने लगे हैं। उसकी बनाई रेखाएँ अब दुखती हैं। अंदर तक दर्द देती हैं। ऐसा लगता है, जैसे हम सबसे छिटक कर यहाँ इन दो कमरों वाले घर में कैद होकर रह गए हैं। हमसे कोई मिलने नहीं आता। जो आते हैं, वह भी हमारी तरह कहीं से उठकर इन शहरों में बस गए हैं। उन्हें भी जब अपने घर की याद आती होगी, वह भी ऐसे अपने अंदर लौट पड़ते होंगे। पर सवाल हमारी ज़िंदगी के इन सालों में अपने बेकार होते जाने का है। हम घड़ी के एक-एक पल के साथ निरर्थक होते जा रहे हैं। एक दिन हम किसी काम के नहीं रहेंगे।

कुछ भी न होना, मेरे मन के अंदर किसी आयतन में बन रही स्थिति नहीं, वास्तविकता है। ऐसा कितनी बार हुआ जब वहाँ से बाबा दादी, चाचा-चाची, संदीप, सुरेस, दोनों बड़े जन, भाभियाँ, उनके बच्चे, बुआ-फूफा, मामा सब एक साथ यहाँ हमसे मिलने आए होंगे। तीस साल की उम्र में आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ। पिछले साल मई में हमारी शादी के बाद यहाँ रखे रिसेप्शन में कितने लोग आ सके थे, यह बात अगर मैं भूल गया हूँ तो मोबाइल में रखी तसवीरों को पलटकर आसानी से देख सकता हूँ। यहाँ से एक का जाना आसान है। वहाँ से सबका आना नहीं। इधर हम यह आसान काम भी नहीं कर रहे।

इस भाव तक पहुँचने में मेरे अंदर की अति भावुकता की कितनी भूमिका है, इसकी पड़ताल किए बिना कभी-कभी, जैसे आज लगने लगा है, मेरी उम्र के यह पल कभी लौटकर मेरी आँखों के सामने नहीं लौटने वाले। यहाँ बीत जाने के बाद कोई वापसी नहीं है। जैसे-जैसे मैं बड़ा होता जा रहा हूँ, हमारे माता-पिता के गाँव में भी सब उसी समानुपातिक गति से बड़े होते जा रहे हैं। यह ख़ुद को धोखा देने जैसा है कि वह हमारे सामने बड़े हो रहे हैं। हम लोग पिछले साल अप्रैल के बाद से वापस नहीं गए। पता नहीं वहाँ क्या-क्या हमारी गैर मौजूदगी में बदल गया होगा। जिसे हम जब अगले साल या उसके अगले साल पहुँच कर देखेंगे तो वह किसी जादू से कम नहीं लगेगा। हम भले सोचते रहे, सब कहीं किसी ख़ास क्षण में रुके हुए हैं। पर ऐसा होता कहाँ है। कुछ भी ऐसा नहीं हैं, जिसके अंदर से गुजरकर हम वापस लौट जाएँ। लौट आने के रास्ते हम यहाँ साल-दर-साल रुके रहकर ख़ुद बंद कर लेंगे। एक दिन ऐसा आएगा,  जब वहाँ हमें कोई नहीं पहचानेगा। तब भी ऐसे अकेले कमज़ोर पलों में कमरों की चार दीवारी में बैठे सोचते रहेंगे, यहाँ कुछ भी नहीं है।

ऐसी स्थिति में हम लोग अपने साथ क्या करते हैं? क्या हम लोग कुछ कर सकने की हालत में कभी होते भी हैं? पता नहीं वह परिवार जिनका इस शहर से बाहर कहीं कोई नहीं है, वह कैसे इन मरते हुए शहरों में रह रहे होंगे। हम ख़ुशकिस्मत है या कुछ और कि हमारा दिल इस शहर की धड़कनों के साथ नहीं धड़कता। अगर आज मैं इस तरह के सवालों को अपने अंदर पाता हूँ, तब इस शहर को भी सोचना चाहिए ऐसा क्यों हुआ जब उसकी सारी चकाचौंध धरी की धरी रह गयी। यह ख़ुद को जितना सुविधाजनक कहता नहीं थकता, उतना ही हम सबको अंदर से अकेला करते जा रहा है। फ़िर देखने लायक यह बात भी है कि भावुकता से जब हम कोरी बौद्धिकता पर इस तरह आते हैं, तब क्या अगली पीढ़ी में भी यह भाव इसी तरह तैर रहे होंगे? क्या यह उस गाँव से कुछ लोगों के इन शहरों के कोनों में बस जाने के बाद ख़ुद खत्म हो जाएँगे? या एक दिन ऐसा होगा वह गाँव मेरे हृदय से निकलकर मेरी यादों से हमेशा चले जाएँगे। पता नहीं इन मुश्किल-मुश्किल सवालों के क्या जवाब होंगे? या यह सब हमेशा ऐसे सवाल ही अनसुलझे सवाल बने रहेंगे। हमेशा।

पता है, यह सब क्या है? असल में यह ठंड का मौसम मुझे एक ख़ास तरह के अवसाद से भर देता है। ठंड हो न हो, पर अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी, इन दिनों अपने साथ अँधेरा जल्दी ले आती है। कहाँ मैं सात-सात बजे तक सूरज को देखने वाला और कहाँ इन दिनों पाँच बजते ही रात होने लगती है। रात सोने के लिए है, इस तरह जागने, पढ़ने, कमरे में अकेले बैठने के लिए नहीं। फ़िर हर साल, साल ख़त्म होते-होते मेरा मन कहीं किसी और धरातल पर चला जाता है। जब मेरा मन खिड़की के बाहर देखने का करता है और उस पर परदा देख देखकर खिसियाहट से भर जाता हूँ। अब जबकि देख रहा हूँ दिमाग मुझपर हावी हो गया है, जा रहा हूँ। थोड़ी देर और अकेले बैठकर डूब जाऊँगा। उन बचपन के अपने बनाए किस्सों को जो मेरे मन में ही कहीं इधर-उधर पड़े होंगे, एक साथ इकट्ठा करके इस शहर को कोसुंगा। जब कोसकर थक जाऊँगा, तब एक दिन यहाँ से वापस लौट जाने की बात डायरी में लिखकर रख दूँगा।

{ तीन दिसंबर। शाम छह से सात के बीच की उधेड़ बुन। अब कमरे से बाहर जा रहा हूँ। जो यहाँ नहीं दिखा, उसे डायरी से मिला लेना कभी..}

4 टिप्‍पणियां:

  1. असल में यह ठंड का मौसम मुझे एक ख़ास तरह के अवसाद से भर देता है। ठंड हो न हो, पर अपनी धुरी पर घूमती पृथ्वी, इन दिनों अपने साथ अँधेरा जल्दी ले आती है।

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    1. जी। पता नहीं यह ठंड का मौसम हर बार मुझे ऐसा करता जाता है। कभी कह पाता हूँ, कभी नहीं..

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  2. ये अवसाद ही जो इस तरह की वैचारिकता में बहा ले जाता है। इस पर हमारा वश नहीं हो सकता शायद। लेकिन इस भावना को शब्‍द देकर कुछ शान्ति जरूर मिलती है। नहीं? शायद आप हां कहेंगे। फि‍र यह भावना एक प्रकार की दार्शनिकता भी तो गढ़ लेती है हमारे लिए, जो सामान्‍य अवस्‍था में हमारे लिए घट ही नहीं सकती थी।

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    1. अवसाद के भीतर मवाद की जो गंध है, वही खींच लेती है कभी-कभी। फ़िर जहाँ तक सामान्य रहने की बात है, मेरे उस्ताद कहते हैं, लिखना हमेशा असमान्य परिघटना होती है।

      इस पर फ़िर कभी।

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