दिसंबर 18, 2015

मन भाग रहा है..

मन भाग रहा है। पता नहीं क्या है, जिसके न होने से लिख नहीं पा रहा। अजीब-सी स्थिति है। कभी मन करता है, एक एक अधूरी पोस्ट खोलकर उसे पूरा करता जाऊँ। पर नहीं कर पाया। वहाँ से वर्ड में लिखने बैठा हूँ तो अब बाहर निकल कर घूम आने को जी चाह रहा है। शुक्रवार शाम पौने सात बजे इस तरह परेशान होने से बचने की कोई तरकीब मेरे पास नहीं है। मुझे भी पता है, कुछ होना जाना है नहीं। इसलिए जबर्दस्ती लिखने बैठ गया। बाहर जाकर भी क्या करूंगा? कोई भी तो वहाँ नहीं होगा। जो भी है, मन में है। मन सबसे बड़ी बीमारी का नाम है। लोग मन को मनाने के लिए पता नहीं क्या-क्या करने लगते हैं। मैं उसकी ऐसी-तैसी करने लगता हूँ।

बातों-बातों में वह कहने लगी तुम इधर जब भी लिख रहे हो, तुम्हारे लिखने में एक पुरुष की गंध है। वह पुरुष, जो स्त्री को बहुत कोमलता से अपने मन में उकेरता है तो उसकी बुनावट में भी वही रूढ़िबद्ध छवियाँ हावी हो जाती हैं, जिनसे इस खास तरह के दौर में हमारा टकराव है। स्त्रियाँ हमेशा ऐसी ही आती रहेंगी, तब काम कैसे चलेगा? पता नहीं मैंने कैसे कुछ-कुछ कहकर तुम्हें उलझाए रखा। कह दिया, कभी-कभी मन को खुला छोड़ देने पर बिन परत, उस सतर्कता के अभाव में जो कुछ भी उन पन्नो पर आता है, वह भी तो मेरे मन के भीतर चलने वाली प्रक्रियाओं को किसी हद तक कहता होगा। वह मेरे लिए एक 'टेक्स्ट' है। मैं ख़ुद को समझने के लिए उन सुरागों को वहाँ छोड़ देता हूँ। कभी मेरे नहीं तो किसी के काम तो वह आएंगे। और भी पता नहीं कौन-कौन सी बवाल बातें।

इस बात को तो मैं डायरी में लिखना चाह रहा था, यह यहाँ कैसे आ गयी। हफ़्ते भर बाद भी वहाँ कोई एन्ट्री नहीं है। चलो जाने देते हैं। तुम लिखती नहीं और मैं लिख रहा हूँ तो यहाँ सबके सामने तुम्हारी बात लेकर बैठ गया। पता नहीं तुम इसे पढ़ते पढ़ते क्या सोच रही होगी। मैं सोच रहा हूँ, उस लड़के के बारे में जो उस दिन ग्वायर हाल की कैन्टीन में अपने वापसी के समान के साथ वहाँ मौजूद था। उसकी ट्रेन साढ़े नौ बजे थी। गले में मफ़लर डाले उसकी चमकती आँखें कुछ और ही कह रही थीं। हम ऐसी जगह हैं, जहाँ हम अपने मन की बात फ़ोन के अलावे किसी और से साझा नहीं कर सकते। मन वही, जिसे हम अपनों के सामने खोलते हैं। उसकी आँखें सपनों से भरी हुई हैं, उसकी आवाज़ में आने वाले कल सच हो जाने वाले ख्वाब ख़यालों की तरह तैर रहे हैं। उसने किताबों को अपना साथी बनाया। उसके पास ऐसी कहानियाँ हैं, जिसे वह लिखना भी चाहे, तब भी उस गति से वह नहीं लिख पाएगा, जिस गति से वह उसके दिमाग में कौंध जाती होंगी। तुम भी कहाँ लिखना शुरू कर रही हो। बहाने बनाती हो बस। कभी लिखना, मन मारकर।

बहाने सब बनाते हैं। वक़्त नहीं है। क्या करूँ लिखकर। कोई पढ़ लेगा तब। पता नहीं, जितना दिमाग इन सब बातों को कहने में निकाल देते हैं, उतने में तो पता नहीं क्या-क्या कह दूँ मैं तो। मैं कभी बातों से खाली नहीं होना चाहता। मैं चाहता हूँ, भले लिख न सकूँ पर मन लिखने को होता रहे। मैं कह कह कर उन्हें अपने भीतर रख लूँगा। भीतर रख कर उन्हें भूलता रहूँगा। कई बातें भूल जाने लायक होती हैं। जैसे यह साल भूल जाने की सारी हदें पार कर चुका है। इन हद निहायत बेकार दिनों के गुज़र जाने में अभी भी कुल दो हफ़्ते बचे हुए हैं। यहाँ नहीं कह सकता। पर न मालूम कितनी बार डायरी में लिख लिख कर अपने दिल को मना चुका हूँ। साल दो हज़ार पंद्रह, तुम कभी लौट कर भी मेरी यादों में मत आना। कोई ऐसी जगह होती तो सच में उस जगह जाकर कल तक जितने भी दिन इस साल से चले गए हैं, उन्हें अपने मन से मिटा देता। मिटाने के लिए हमेशा हमारे पास बहुत सारी बातें होती हैं, पर दुख के दिन इतनी आसानी से मिटते नहीं। मैं भी फरवरी से कोशिश कर रहा हूँ, नहीं चाहकर भी उसमें फँस जाता हूँ। तारीख़ थी दो फरवरी। दिन सोमवार। वक़्त यही कोई दोपहर का रहा होगा। मुझे पता है, एक दिन तारीख़ धुँधली पड़ जाएगी पर वह एहसास दिल में चुभता रहेगा।

तभी मैं नहीं लिखता, बिना त्ययारी। पता नहीं कौन-सी बात कब कहाँ से निकल कर सामने आजाये। जैसे कितने दिन हो गए पूजा, तुम्हारे लिए एक ख़त अंदर ही अंदर उमड़-घुमड़ रहा है। तुम कहानियाँ कहती, पर ऐसा क्यों होता है, तुम्हें ढूँढ़ने लगता। तुम जब नहीं मिलती, तब बैठ जाता। नहीं समझ पाता, क्यों हो रहा है, इधर ऐसा, बहुत जादा। शायद उस ख़त में भी इतनी पंक्तियाँ होती। और तुम सागर, तुमसे तो बाद में निपटता हूँ। तुमने संदीप को पढ़ा कभी? पढ़कर देखना। तुम जैसे ख़ुद को देख रहे होगे। ख़ैर अभी जाना है। नीचे। सीढ़ियों से। आहिस्ते-आहिस्ते। बल्ब फ्यूज़ हो गया है।

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