दिसंबर 14, 2015

हम वहीं खड़े हैं, चुपचाप

रात साढ़े दस बजे के बाद। छत पर टहलते हुए। एक हाथ से कान पर फ़ोन। दूसरे से नाक पोंछते हुए। दिल्ली की ठंड ऐसे ही हरबार इन दिनों में घेर लेती। इस बार भी कश्मीर में बर्फ़ गिरने के बाद से बढ़ गयी। वापस कमरे में लौट कर सोच रहा हूँ एक ख़त लिखने बैठ जाऊँ। तुम्हारी बहुत याद आ रही है। पता नहीं हमारी ज़िन्दगी की वह कौन-सी शाम होगी, जब हम भी ऐसे इस ढाँचे के सामने इन दोनों की तरह खड़े एकदम चुपचाप, एकटक, एक दूसरे को देख रहे होंगे। वक़्त एकदम थम चुका होगा। थम चुकी होंगी, बारिश की बूँदें।

बर्फ़ दज़ला फ़रात में गिरती, महसूस हमें वहाँ पैरिस में होती। एन ईवनिंग इन पैरिस मेरी जान। शम्मी कपूर और शर्मिला टैगोर के बाद हम ही पहुँचते वहाँ। डायरेक्ट। शक्ति सामंत को भी लगने लगेगा, उसे फ़िल्म में हमें लेना चाहिए था। ख़ैर अभी शार्ली एब्दो पर हमले के बाद से वहाँ के टिकट कुछ सस्ते हुए हैं। देखता हूँ, कितने में बात बनती है। वैसे अपनी सारी किताब बेच भी दूँ, तब भी कोई जुगाड़ होता नहीं दिख रहा। सोच रहा हूँ, किसी अमेरिकन जर्नल में कोई धाँसू-सा रिसर्च आर्टिकल भेज दूँ। कभी कोई फ्रांस की यूनिवर्सिटी बुलाएगी तो कह दूंगा, अपनी पत्नी के साथ आऊँगा। टिकट दो भेजें। मुझे पता है, वह मान जाएँगे। उन्होने अमेरिका को स्वतन्त्रता की मूर्ति  भेजी थी। उसने पूरी दुनिया को उजाले से भर दिया है। वह बहुत उदार देश है, चिंता मत करो। वह सब देख लेंगे। बस हम पासपोर्ट की अर्जी लगाने कल ही बाराखम्बा रोड चल देंगे।

तुम भी कभी-कभी सोचती होगी। कैसी बात करने लगता हूँ कभी-कभी। पर क्या करूँ। तुम्हें लेकर बहुत सोचने लगता हूँ। मन के अंदर। बाहर। सब जगह। जब तक वह सब देश मिलकर हमारी दुनिया को तबाह करते हैं, चलो थोड़ी देर इस रात में थोड़ा घूम लेते हैं। पर तुम भी हद करती हो। मास्क नहीं लायी।

भूल गयी एचएल दत्तू क्या कह रहे थे, अपने पोते के बारे में उस दिन ये दिल्ली है, मेरी जान। जाने बहार। बस थोड़ा हट के। थोड़ा बचके।

2 टिप्‍पणियां:

  1. तुम्हारे सर्द ख्यालों ने लोकल और ग्लोबल सब समेट लिया ।उम्दा

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    1. कोई उस दिन एक किताब देख रहा था, दुनिया अब गोल नहीं। सपाट हो गयी है। सपाट हो गयी हैं, हमारी इच्छाएं। इन्हीं से अब बचना है।

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