दिसंबर 13, 2015

मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी..

कभी-कभी हम भी क्या सोचने लग जाते हैं। कैसे अजीब से दिन। रात। शामें। हम सूरज के डूबने के साथ डूबते नहीं। चाँद के साथ खिल उठते हैं। काश! यह दुनिया सिर्फ़ दो लोगों की होती। एक तुम। एक मैं। दोनों इसे अपने हाथों से बुनते, रोज़ कुछ-न-कुछ कल के लिए छोड़ दिया करते। कि कल मुड़कर पहले से यहीं पेड़ के पीछे छिपे मिलेंगे, तब देखेंगे। तब देखेंगे, तुम्हारे डुपट्टे का हवा में लहर जाना। उसका उड़कर तुम्हारे चेहरे पर ढक जाना। तुम भी कैसे धीरे-धीरे कदम बढ़ाती मेरी तरफ़ चली आती। के सब जानती जैसे यहीं छिपे-छिपे तुम्हें देखता रहता। तुम्हारे चेहरे पर अमलतास की सी रंगत जो मुझे न पाकर होती, वह मुझे देखते ही गुलमोहर की चमक में बदल जाती। तुम मुझमें परछाईं बनकर ढल जाती। मैं तुम्हारा अक्स बनकर उभर आता।

उस छत पर मुझे हमेशा तुम दिखाई दिया करती। घूमती। हँसती। बात करती। तुम्हारी आँखें मुझे अपनी आँखें लगा करती। आँखें हमेशा से प्यार में ऐसी हुआ करती। छूती। छिपती। कुछ न कहती, चुप रहती।

सब कुछ कितने अनगिन सपनों जैसा होता। जैसे होता घास का मैदान। उसकी ढलान पर लुढ़कते। हम वहीं बैठे रहते। पेड़ के नीचे। नदी किनारे। पानी की तरह बहते, कुछ छन और बहते। बहना, साथ गुज़रने जैसा होता। जैसे गुज़रती गौरैया की चहचहाहट होती। हम भी एक-दूसरे के कान में कुछ बुदबुदाते। कुछ बुलबुलों की तरह नीचे उतरते उबरते। तब मैं एक ख़त लिखकर तुम्हारी आवाज़ के साथ कहीं रख देता। तुम देखती, पर तुम्हें न दिखता। जैसे हम सामने न होने पर नहीं दिखते वैसे। तुम उसे छूती तो छू जाता। तुम उन पंक्तियों को गुनगुनाती वह लय बन जाता। जैसे रात के इन बीतते पलों में हम साथ शरारतों में मिसरी की तरह होते। जैसे पल-पल हम एक दूसरे में घुल जाते। ऐसी ही घुलती, तुम्हारी आवाज़ ले आया हूँ। सुन लेना..

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