दिसंबर 11, 2015

काँख के बाल में फँसा बेआबरू दिल

उस वक़्त उसकी काँख में कोई बाल नहीं था, जब पहली बार उसने उसे वहाँ चूमने के साथ अपनी दूसरी प्रेमिका की याद को विस्मृत करते हुए वह तस्वीर खींची थी। दोनों अभी एक-दूसरे के लिए नए-नए साथी बने हैं। वह अकसर अपनी सहेलियों से सुनती रहती। लड़कियों का ‘सेफ़ डिपॉज़िट’। वह उसकी एफ़डी था। शांत, अकेला, रोमेंटिक, बिना दिमाग वाला। उसके पास बस दिल था। दो आँखें थी। पर देने वाले ने उसे सोचने के लिए ज़रूरी समान नहीं दिया था। उसे पसंद थी वहाँ पसीने के सूख जाने के बाद उठने वाली गंध। वह उसमें इस शहर में धुंध के आने से पहले धुंध को महसूस कर लेता। उसे लगता ऐसा कर लेने से कल आँख बंद करके भी वह पानी का जहाज चला लेगा।

जहाज हवा में भी उड़ते हैं, उसे पता नहीं था। उनका जहाज हर रात उन दोनों के बीच उड़ते हुए मालुम पड़ता। वह अगल बगल बिन छिली काँखों के बीच एक दूसरे के मुँह में मुँह दबाये पड़े रहते। यह उनकी आदत भी थी और जगह न होने की मजबूरी भी। मजबूरी अक्सर पति पत्नी को इतनी पास लाती होगी और ऐसा सोचकर वह थोड़ी और पास आकर चिपक जाते। रात जैसे जैसे गाढ़ी होती रहती उनमें फ़र्क करना मुश्किल होता कौन कहाँ से शुरू है और कहाँ ख़त्म। उन्होंने किसी को पैमाइश नहीं करनी दी वरना कोई तो अब तक बता देता। ख़ैर, जाने दीजिये।

अब आप भी सोने जाइए। रात काफ़ी हो गयी है। इतनी रात किसी के कमरे में ताकझाँक नहीं किया करते। ये अच्छी बात नहीं है।

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