दिसंबर 23, 2015

धुँधली रात की रौशनी और लप्रेक के बहाने कुछ बे बात

कभी लगता है, एक दिन ऐसा भी होगा जब यहाँ लिखा हुआ एक-एक शब्द कभी किसी के समझ में नहीं आएगा। जैसे मुझे अभी से नहीं आ रहा। यहाँ की लगती गयी तस्वीरें इन सालों में जितनी ठोस, मूर्त, स्पष्ट हुई हैं, उसी अनुपात में सत्य उतना ही धुँधला, अधूरा, खुरदरा होकर मेरे भीतर घूम रहा है। घूमना, सिर्फ़ दिमाग की नसों में नहीं बल्कि किसी को न जताते हुए चले जाने के बाद उपजे खालीपन से घिर जाने के बाद की कचोटती स्थिति है। एक अजीब तरह का ‘नेक्सस’ दुरभिसंधि बनकर हमें मूल्यहीन साबित करने पर तुला हुआ है। वहाँ दूसरी तरफ़ दावे हैं, एक भरा पूरा भ्रष्ट तंत्र है, जो उन्हें खड़ा करने में सहायक की भूमिका में है। इन अमूर्त और समझ में न आने वाली बातों में वह कभी नहीं समा सकते। वह थोड़े-थोड़े पूंछ के साथ बाहर ही रह गए हैं। पूरे अंदर नहीं आ पाये हैं। घोंघे की तरह आ रहे हैं। धीरे-धीरे। आहिस्ते से।

यह ‘सापेक्षता’ का नया सिद्धान्त गढ़ रहे हैं, जिसकी रौशनी में हमें खुद को साबित करने की लड़ाई नए सिरे से नहीं, नए औजारों और नयी तकनीकों के साथ लड़नी होगी। ऐसी लड़ाई जो दिखेगी नहीं पर वह हमारे सामने ही होगी। उनके पास औपनिवेशिक भाषा है। हर वह भाषा जो किसी-न-किसी को दबाकर आगे बढ़े वह इसी चरित्र की भाषा है। वह हिन्दी वाले हैं, पर उनकी पहुँच उनतक है, जहाँ से वह इस दुनिया को नए तरह से कहने का सहूर सीखते हुए सीधे हम तक पहुँच गए। एक ख़ास तरह का ‘फ़ेवरीज़म’ सबके सिर पर चढ़ कर बोल रहा है। हम माने न माने, पर यह है।

हम जो कुछ भी लिख रहे हैं, उसका कहीं कोई नोटिस नहीं ले रहा। हम तो खाना खाने के बाद उठते हुए अपने चूतड़ों पर हाथ पोंछने वाले ‘मिडीयॉकर’ ठहरे। हम नाक में उँगली डालते हुए सोचते हैं। पता है, कुछ नहीं हो सकता। यह दुनिया ऐसे ही चलती रहेगी। हमने ख़ुद कभी इस तरह नहीं बनाया। ‘लप्रेक’ हम भी लिख लेते अगर हमारे पास तब इंटरनेट की पहुँच होती। ऐसा कहकर मैं इस पूरे लिखे हुए को ख़ारिज़ नहीं होने दे सकता। इसलिए नहीं लिख रहा। यह एक विधा के निर्माण की उत्तर आधुनिक पूर्वपीठिका भले हो पर हम इस ब्लॉग को कभी मुख्यधारा में नहीं ला सके। इसे समझने की ज़रूरत है।

2.
हम एक ऐसे दौर में हैं, जहाँ हम पाठक को एक कमज़ोर कमजर्फ़ संस्था में परिवर्तित कर रहे हैं, जिसकी मानसिक योग्यता पर सबने शक किया है। उसकी रुचि, अभिरुचि, स्वाद, चिंतन, जीवनशैली, अवकाश, रिक्तता, एकांत, दृष्टि, मूर्त अमूर्त विषयों को निर्मित करने में पूंजीवादी, उपभोक्ता, नवउदार, नव साम्राज्यवादी संस्कृति गढ़ रही है। जहाँ उसकी स्वतन्त्रता कहीं चिन्हित भी नहीं हो पा रही। जिसके साथ वह पहली बार संभोग करने की इच्छा से भर जाता है, वह उसे नाचती-गाती, पीठ उघाड़े, रुपहले पर्दे पर पीवीआर सिनेमा हाल के अंदर घुप्प अँधेरे में मिलती है। उसी पल वह जिसके साथ गया है, उसके लिए ऑनलाइन शॉपिंग से ख़ास आकार के कपड़े खरीदने की इच्छा से भर गया है। हमारी इस आदिम इच्छा का इससे विद्रुप रूप कोई और नहीं रच रहा। हम ख़ुद रच रहे हैं। बचपन से एक ख़ास तरह से सोचने और अंतिम निष्कर्षों पर पहुँचने वाली तर्कशास्त्रीय पद्धति पहले ही दीमकों द्वारा चांटी जा चुकी है। अब हम सिर्फ़ एक दर्शक हैं। जिसके पास दिमाग तो है पर उसके व्यवस्थापक हम नहीं हैं। पढ़ना तो खैर बहुत बाद की संस्कृति का हिस्सा है। जब हमारे पास पैसे से लेकर फुर्सत से बैठने की जगह हो। इसका मतलब यह नहीं है, हमारे पास एक समझ भी है, जिसका हम इस्तेमाल करने वाले हैं।

3.
यह सिर्फ़ फ़ेसबुक या ऐसे किसी माध्यम से निकले ‘टेक्स्ट’ नहीं बल्कि जनसंचार माध्यम में चर्चित एक ख़ास रुझान वाले व्यक्ति की रचना है। जिसके पास ‘बेस्टसेलर’ होने की संभावना पूर्वनिहित है। यह उनकी आलोचना नहीं, बल्कि उनके पेशे में निहित सुविधा को समझने की कोशिश है। आप उस देश और काल के लेखक हैं, जिसने लिखना पहले चुना या टीवी पत्रकारिता(?) यह सवाल स्थगित भी रखा जाये, तब हमें इसे उल्टे सिरे पर जाकर फ़िर से रचना चाहिए। क्यों एक प्रकाशक किसी ख़ास व्यक्ति को चुनता है। यह कोई छिपा हुआ भेद नहीं, जिसे कोई नहीं जानता हो। हम संभावनाओं को बना नहीं रहे। उन्हें टटोल भी नहीं रहे। हम पहले से बने बनाए खाँचों में ‘सार्थक’ बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इसे हमें और किस तरह से देखना चाहिए? क्या यह इस माध्यम में लिख रहे लोगों के लिए एक शुरुवात या किसी मंच का काम करेगा या ऐसी किसी भूमिका में आने की संभावनाओं को रेखांकित किया जा सकता है? मुझे नहीं पता। पता नहीं यह सवाल भी हैं या नहीं इसी बात को लेकर बहस न होने लगे। जो लोग इसे मेट्रो में हिन्दी की किताब को हाथ में लेकरपढ़ने के किस्से  रच रहे हैं और इसे सीधे सीधे अँग्रेजी बाज़ार से टक्कर लेती घटना बता रहे हैं, उनसे मुझे ख़ास संवेदना है। उनका कुछ नहीं हो सकता। वे ऐसे ही रहेंगे।

यह प्रिंट माध्यम के लोकतान्त्रिक होने की मिसाल नहीं, उसके पुनरुत्पादन के मॉडल पर चलने की एक और कहानी है। बात साफ़ है, इसने उसी स्पेस को बनाया है, जिसमें हमइंडियन एक्सप्रेस, क्विंट  औरअमेरिकन बुक रिव्यू  में इस लप्रेकगाथा  को पढ़ रहे हैं। यह इसके अलावे कुछ और नहीं है। हम बाहर थे। बाहर ही रहेंगे। हमारे अंदर आने में अभी वक़्त है। फ़िर बाक़ी जो बच गया, उसे कभी बाद में। हर बात कह दी जाये ज़रूरी नहीं। इसलिए अबभी नहीं।

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