दिसंबर 05, 2015

सपने की गंध और स्टेचू ऑफ लिबर्टी

सपना। इस एक शब्द में ऐसी दुनिया है, जहाँ हम सब चले जाना चाहते हैं। कोई भी ऐसा टुकड़ा जो हमें अपनी तरफ़ चुंबक की तरह खींचता रहता है। खींचना शहद की तरह मधुमक्खी का भी होता है और उस छोटे नवजात बच्चे का अपनी असहाय लेटी कमज़ोर माता की तरफ़ भी। जैसे गाडियाँ खींची चली आती हैं, पेट्रोल पंप की तरफ़। जैसा अमेरिका खिंचा चला जा रहा है, उन प्रकृतिक संसाधनों की तरफ़। मुझे नहीं लगता था कि कभी वह ऐसा भी कहेगी। पर कल बात करते वक़्त वह बोली, अमेरिका एक दिन ख़त्म हो जाएगा। उसने जिस तरह दुनिया को बुनने वाले रेशों को उधेड़कर रख दिया है, वह ख़ुद इससे नहीं बच पाएगा।

उसी देह से आती गंध में भूल गया, उससे पूछना, कैसे होगा ख़त्म। मैं बस अपने सपने में उसके साथ कुछ देर साथ बैठे रहने के ख़याल से भर गया। अभी भी हम साथ थे। पर अकेले नहीं थे। उसके चश्में का फ्रेम मुझे स्टेचू ऑफ लिबर्टी  की नाक पर चढ़ गया मालुम पड़ा। मुझे उससे समता, समानता बंधुत्व सीखना है। यह मुझमें तुम ही ला सकती हो। ऐसा सोच उसके थोड़ा और पास जाने लगा। कि रुक गया। इस तरह दिमाग चलने पर दिल धड़कना बंद कर देता है। सच वह बंद हो गया और हम दोनों एक दूसरे से मुक्त हो गए। छूने की दूरी से देखने की दूरी तक।

अगले ही पल हमने तय किया हम बाजीराव मस्तानी  नहीं देखेंगे। हमने मोहब्बत की है, अय्याशी नहीं की है।

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