दिसंबर 03, 2015

इस तरह, मैं भी एक दीमक हूँ

मुझे नहीं पता लोग कैसे लिखते हैं। पर जितना ख़ुद को जानता हूँ, यह लिखना किसी के लिए भी कभी आसान काम नहीं रहा। हम क्यों लिख रहे हैं(?) से शुरू हुए सवाल, कहीं भी थमते नहीं हैं। उनका सिलसिला लगातार चलता रहता है। पर एक बात है, जो इस सवाल का एक ज़वाब हो सकती है। वह यह कि हमारे आसपास ऐसे सुनने वाले हरदम नहीं होते, जो अंदर चलने वाली उधेड़बुन को सिरे से सुलझा सकने की फ़ुरसत से भरे रहते हों। फ़िर इसका मतलब यह भी नहीं कि वह जो इसे डायरी में या यहाँ पढ़ रहे हैं, उन्हें भी यह पूरी तरह उसी लहज़े में समझ आ रही हो, जैसी यह हमारे अंदर चल रही थी। फ़िर सवाल तो यह भी है कि जैसी अंदर चल रही थी, उसके लिए अपनी जेबें ऐसी भाषा से भरी होनी चाहिए, जिसमें जो जब जहाँ, जैसा चाहा, कह दिया। पर हर बार चाह कर भी ऐसा होता नहीं।

ख़ैर, बात पर वापस लौटते हैं। जो सोच कर यह बात अपने अंदर शुरू करने का मन हुआ। अब जबकि तुम ब्लॉग बनाने की बात कह रहे हो तो जान लो, यहाँ लिखना इतना मुश्किल नहीं है, जितना मुश्किल यहाँ लगातार लिखना है। हम यहाँ क्या लिख रहे हैं, किसके लिए लिख रहे हैं, इनसे लगातार जूझते हुए लिखते रहना ज़रूरी है। जितनी आसान यह दुनिया देखने में लगती है, उससे कहीं जादा इसके रास्ते हैं। हम कभी-कभी डायरी में वह सब लिखने से बचते हैं, जो यहाँ चुपके से किसी की ओट में रहकर धीमे से कह देते हैं। कहना, सबसे पहले अपने अंदर घटित होता है और बाद में बाहर आता है। इस पिछली बात से संबन्धित कोई सैद्धांतिक समझ कभी नहीं बनी पर अपने अनुभवों से इतना तो कह ही सकता हूँ, यह जितना अकस्मात है उतना ही कभी-कभी सुचिन्तित भी रहता है। हमेशा किसी आवेग में आकर लिखना नहीं होता पर लिखते हुए एक अजीब तरह का ताप महसूस ज़रूर होता है।

इन बीतते सालों में मेरे पास कागज़ पर लिखने की एक अलग भाषा दिखती है और जब यहाँ वर्ड फ़ाइल में टाइप कर रहा होता हूँ, तब वह बिलकुल अलग हो जाती है। शायद ऐसा माध्यम बदल जाने के कारण होता होगा। जैसे वहाँ जब तक पैन की स्याही सूखती है, तब तक अगले क्षण की भूमिका बन रही होती है। मैं कागज़ पर बहुत धीरे-धीरे लिखता हूँ। आहिस्ते से। कछुए की तरह टहलते हुए। कोई हड़बड़ाहट जब महसूस होती है, उसमें भावों की सघनता साफ़ दिख जाती है। पता नहीं तब कैसे उन वाक्य संरचनाओं को अपने अंदर उमड़ते हुए देखता हूँ। कई-कई दिन किन्ही बातों को सिर्फ़ वहाँ लिखने के लिए रुका रहता हूँ। मन में उनकी सही जगह और सही पता वही बनता है। कहने में डर लगने वाली बात तो अब मुझ पर क्या काम करेगी। पर कुछ तो है, जो अभी भी पहले वहीं आता है। वहाँ आना एक तरह से तहख़ाने में छिप जाना है। तरतीब से सबका रुक जाना। दूर से देखते रहना। देखते हुए भूल जाना।

लेकिन ऐसा नहीं है, ब्लॉग की बुनावट में एक भावनात्मक दूरी काम कर रही होती है। पर समझ नहीं पाता, यह सयास है या अपने आप घटित होने वाली परिघटना। जहाँ लिखने से पहले किसी बड़ी रूपरेखा बनते ही पोस्ट का वह ढाँचा इतना तरल हो जाता है, जिसमें कई-कई बदलाव उस लिखने के दरमियान होते रहते हैं। कभी लगता है, यहाँ लिखा सब कुछ ‘फेब्रिकेटिड’ सा है। और इसमें मेरे ऊपर एक वक़्त ऐसा भी आया, जहाँ ऐसा लिखने की कोशिश करने लगा, जिससे यहाँ आने वाले लोग बार-बार आने लगें। पता है, वह चीज़ क्या है जिसने मुझे ऐसा बनाया? मुझे भी सही-सही नहीं पता। पर जितना अंदाज़ लगाकर अपने पाठक को समझ पाया हूँ, उस हद पर वह हमेशा एक ऐसी दुनिया की तलाश में रहता है, जो उसे सपनों में ले जाने लायक हो। वह थोड़ी देर किसी ऐसी अकेली जगह पर जाने की तड़प से भर उठता है, जो उसने आज तक नहीं देखी है। दरअसल, हम सबने जिस तरह के समाजों को बनाया, वहाँ सब अपनी मर्ज़ी चलाते हुए भी उस सामाजिक ढाँचे को तोड़ना नहीं चाहते। बस जहाँ वह बार-बार टूटता है, सबसे जादा लोग वहीं लौटते हैं। वह थोड़ी देर के लिए उनकी बनाई दुनिया है। इन क्षणों को जी लेने के बाद, वह उन्हीं जगहों पर यहाँ लौट आने की ख़्वाहिश के साथ वापस लौट जाते हैं।

मैं ख़ुद कौन-सा इस दुनिया और इन दुनियावी झंझटों से आज़ाद हूँ। पर लगता है, शायद वह वक़्त अब मेरे लिखने के लिए मिट्टी बन गया है। मेरे मन का पौधा वहाँ बेल की तरह उगने लगा है। असल में मेरे मन की संरचना में यह समाज कुछ अव्यवस्थित है। यह मुझे वह नहीं करने देता, जैसा मेरा मन करता है। वह मुझे बाँधता है। रोकता है। बार-बार पीछे खींच लेता है। इतना होने के बावजूद मैं कोई सीमातीत स्वतन्त्रता नहीं चाहता। पर इतना लिखते हुए महसूस करता हूँ कि जिस तरह से अपनी बात कहना चाहता हूँ, वह भाव, विचार, स्थिति मेरे भीतर पिघल रही है, उसे अपने हाथों से एक मुकम्मल शक्ल दे सकूँ। वह बना सकूँ जो बनाना चाहता हूँ। अगर शब्दों से मैंने यह दुनिया बनाई है, तो मुझे यह भी पता है; अगर इस दुनिया की बातें उस तक पहुँचेंगी तो वह नाराज़ भी बहुत होगा। पर मैं चाहता हूँ, अगर उसे पता भी चले तो कुछ पल के लिए वह नाराज़ भले हो जाये, पर अपने डर से डराये नहीं।

डरना और न सोच पाना दो अलग-अलग चीज़ें हैं। फ़िर इन शब्दों की यह ख़ासियत है कि इनसे बनाए मंज़र तभी समझ आएंगे, जब हम उन्हे अपने अंदर गहराई तक उतरने देंगे। और शायद यही वह बिन्दु है, जहाँ मेरी भाषा इतनी ठोस न रहकर बारीक धागे की तरह होती गयी है। यह जितनी तरल दिखती है, उतनी तरल नहीं है। वह किस रुई के फ़ाहे से बना है। उसे पहचाना ज़रा मुश्किल है। मन की परतों में छिपे बिम्ब शब्दों में पीछे चाभियाँ छोड़ जाते हैं। किसी नक्शे पर गाढ़ी पेंसिल से लिखकर रबर से मिटा देने की तरह। जो थोड़ा भी उस तरह अपने मन को छोड़ देगी, वह उस मेढ़ तक होते हुए मुझ तक पहुँच जाएगी। जो दिख रहा है, उसके पीछे छिपाकर रखी तस्वीर पर फ़िर क्या होगा, मुझे नहीं पता। शायद अपनी शक्ल देखकर वह शरमा जाएगी बस।

भले आज इस वक़्त तक मेरे लिखे हुए शब्दों का कोई भी ‘सामाजिक मूल्य’ या ‘प्रासंगिकता’ जैसा कोई मूल्यपरक अस्तित्व न हो। पर यह शहर, इसकी सड़कें, गलियाँ, उनमें बचे रह गए गड्ढे, हमारा घर, उसकी दीवारें, दीवार पर चिपकी छिपकली, उस खिड़की के बाहर की दुनिया, सामने की छत पर तुम्हारा होना, इस देश और काल पर मेरी तरफ़ से कर दी गयी व्यक्तिनिष्ठ व्याख्या है। यह पूरी प्रक्रिया एक सकर्मक क्रिया है। अश्लील एकालप होते हुए भी उसके भीतर रचा गया मेरा इतिहास। इसमें किसी किताब की सुंदर-सुंदर पंक्तियाँ भले न हों पर मेरे मन की बुनावट में यह एक ख़ास जगह रखता है। ऊपर से देखने पर यह लिख लिखकर ख़ुद को खाली करने की कवायद से कुछ जादा न लगता हो पर यह सचेत होकर अपने अंदर अपने बाहर घटित होने वाली देखी अनदेखी बारीकियों को लिख डालने की ज़िद है। तस्वीरें भले थोड़ी मटमैली लग रही हों, पर हैं तुम्हारी मेरी इसी दुनिया की।

फ़िर कभी-कभी तो लगता है, जैसा मैं लिखता हूँ, उसे कोई और लिख ही नहीं सकता। शायद यह बात हम सबके मामलों में एक हद तक सच भी हो। हम किसी की तरह नहीं अपनी तरह लिखते हैं। पर यहाँ उससे आगे जाकर यह कहना चाहता हूँ कि अगर कहीं कोई मेरी तरह लिख रहा होता, तो आजतक मुझसे मिल गया होता। हो सकता है, तब मुझे पता चलता, उसकी दुनिया और मेरी दुनिया में बहुत सारी बातें एक-सी दिखने के बाद भी वह दोनों एक-सी नहीं होतीं। या हो सकता है, उसके सब लिखने के बावजूद मैं ऐसे ही लिखता रहता। लिखना जैसे उसकी राजनीति होता, वैसे मेरा हस्तक्षेप होता। पर इन सब भुलावों के बावजूद हम सबको अपने हिस्से की बात कभी-न-कभी ख़ुद कहनी पड़ती है। कहना हमारे होने का सबूत है। हम इसे ऐसे नहीं कह सकते कि मैंने सबके हिस्से का लिख दिया, अब उन्हें लिखने की कोई ज़रूरत नहीं। अगर ज़रूरत नहीं थी तो आप भी कभी कुछ न लिखते। यह दावे हमेशा से झूठ होते हैं और इनकी सतह पर जितनी दीमक इस वक़्त दिखाई दे रही हैं, उतनी कभी नहीं दिखीं। इस तरह, मैं भी एक दीमक हूँ। छोटी सी।

कई बातें अभी भी रह गईं, जो तुमसे करनी थी। आगे की रह गयी बातें जल्द। इसी हफ़्ते।

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