दिसंबर 02, 2015

वह इस्माइल दर्ज़ी की दुकान का सटर नहीं है, (कॉमा)

तीसरी मंज़िल। सबसे ऊपर। इसके ऊपर आसमान। आसमान में तारे। अँधेरे का इंतज़ार करते। इंतज़ार चीलों के नीचे आने तक। वह वहाँ तब नहीं देख पाती, चमगादड़ों की तरह। इन्हे आँख नहीं होती देखने के लिए। वह तब भी नहीं छू जाते कभी किसी पत्ते को भी। हरे-हरे पत्ते। तुम्हारे गाल की तरह मुलायम। तुम इन पर टीवी पर दिखने वाले मॉसचराइज़र क्रीम मत लगाया करो। उसकी गंध में छिप जाती है, तुम्हारी ख़ुशबू। कल उसी गंध से छींकते-छींकते, बार-बार अंदर चुभते रहे नाक के बाल। तुम तो मेरे दिल में उड़ने वाली तितली हो। इन तितलियों के पीले चटक फिरोज़ी रंगों के भीतर उतरती आवाज़ से तुम तक एक तिलिस्म को बुनते बुनते हाँफ जाता हूँ। हाँफना सोचने के बाद काँखों और जाँघों के बीच से निकले पसीने की ऊब से पैदा हुई ऐसी चीज़ है, जहां थक कर चूर हो जाने के अलावे कोई और स्थिति नहीं हो सकती। कभी-कभी इसी उधेड़बुन में दिमाग पगलाने की हालत में पकड़ लेते हैं।

अभी भी वह नहीं कह रहा, जो कहने जा रहा था। उस पहली पंक्ति में रचे दृश्य में सबसे ऊपर की मंज़िल पर पहुँच कर नीचे देखने और उस ठंडी हवा को मनसूसने के अलावा और भी बहुत सारी कतरनें ,वहीं दरवाजे की सिटकनी में उलझ कर रह गयी होंगी। वह सोचने समझने की हालत से पछाड़ खाकर गिरते पड़ने के दरमियान बस यही सोचता रहता। हम जिस तरह इस भूगोल के नक्शे को असलियत मानकर उसमें बंधे हुए ख़ुद को निपटाने की फ़िराक़ में रहते हैं, दुनिया उससे कहीं बड़ी है, जो उस नक्शे से बाहर छितरी पड़ी है। उनके होने न होने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ऐसा सोचना बेवकूफी से अलग आले दर्ज़े की पैमाइश से कम नहीं है। बिलकुल वैसे, जैसे हम सब पश्चिम की महान परियोजना की चपेट में आने से नहीं बच पाये। उन टकसालों ने हमारी दुनियावी हकीकत को ठोस, स्थूल, भोथरा, अधूरा, खुरदरा, अनचाहा, चिपचिपा बनाकर छोड़ा। उसका कोई ऐसा आकार नहीं, जो आँखों से पकड़ा जा सकता हो। वह सामने दिखते हुए भी हमारी आँखों से ओझल है। हर वस्तु उत्पाद में बदलकर हवा में पिघल गयी है। हम सब उसी में साँस ले रहे हैं। एक तरह की बीमारियों में हम भूगोल की रेखाओं के आर-पार घिरते जा रहे हैं। हवा, पानी, ज़मीन सब उस रेगिस्तान की रेडियोधर्मी अवगुणों को अपने अंदर क्लोरोफ़िल की तरह अवशोषित करती रही। वहाँ बुद्ध मुस्कुरा रहे होंगे या उन देशों के सरमाबरदार(?) पता नहीं।

प्यार इन दो अलग तरह की बातों के बीच हमारे गर्भ में कैसे पल रहा है, किसी देखने लायक बात की तरह उकड़ू बनकर बैठ गयी। जैसे ऊँट भी ऊँटनी की तरफ़ देखकर यही सोचता रहा, काश! यह भी कहीं किसी हरे भरे मैदान में दूसरी तरफ़ से दौड़कर मेरी तरफ़ आती और इसके स्तनों से मेरा सीना एकदम चिपट जाता। उसके लिए इतने छोटे कपड़े खरीदता, जिसमें उसके सारे अंग उघड़े रहते। ख़ासकर इन ठंडी होती दिसंबर की शामों में होने वाली दिल्ली की रात वाली शादियों में पहनने वाले ब्लाउज़ की पीठ। चिकनी। फिसलती। उभार लिए कंधों में दिख जाने वाले धागे, जो उसके स्तनों को एक विशेष पूंजीवादी आकार में ढाल रहे होते। पर लगता है, अब मुझे रुक जाना चाहिए। अमज़ोन, फ्लिपकार्ट के अलावे मयन्त्रा ने अभी मनुष्य के इतर किसी और जाति को खँगालने की कोशिश नहीं की है। न यह किसी चाँदनी चौक के कटरा नील के बगल से जाती सड़क पर खुलती किसी दर्ज़ी की दुकान का बंद सटर है। नमाज़ का वक़्त है। ऐसा सोचकर, वह हरबार गौरीशंकर मंदिर से पानी पीकर लौट आते। इंतज़ार करते, ऊँटनी के सीने का माप मिले तो सिलना शुरू करें।

पर आपका क्या करूँ। आप भी मोहतरमा कभी-कभी अश्लील हो जाने तक मुझसे लिखवा ले जाती है। ऊपर पढ़ते हुए कभी आपने सोचा नहीं कि हम भी पहले ऊँट और ऊँटनी की तरह पूरे नंगे थे। और अब बस हम इन सदियों में अपनी देह पर उग आए कपड़ों को निकालकर फ़िर से नंगे होने की तय्यारी कर रहे हैं। इसे अपने बेसिक्स पर वापस लौटना कहते हैं। यह किसी भी तरह से सांस्कृतिक पुनरुत्थान नहीं कहा जा सकता। यह आदिम सभ्यता के विकास का स्वाभाविक विकास क्रम है। जहाँ से हम चले थे, वहाँ लौटा ले जाने की प्रक्रिया में सब कैसी-कैसी युक्तियाँ लगा रहे हैं। हमें उनका काम आसान कर देना चाहिए। बस, पहले के मुक़ाबले हो इतना ही रहा है कि हम अब कुछ भी करने से पहले, एक तर्कशास्त्र को अपने भीतर पनपने देते हैं। हमें लगता है, हमारा दिमाग हमारे अधीन हैं। पर वह हमें जितनी भी स्वतन्त्रता दें, हम लौट लौटकर उन्ही निष्कर्षों की तरफ़ लौट जाते हैं। जो हमें एक ऐसे घेरे में समेट कर रख देते है, जहाँ हम ऊँट और ऊँटनी की कल्पना करने लग जाते हैं। उनमें अपनी छवियाँ डालकर छन भर देखिये। पता चलेगा। मधुर भंडारकर की अगली फ़िल्म इसी आइडिया पर है। पर आपको लग रहा होगा, यहाँ तक लाकर मैंने जेब काट ली। अगर कहूँ कि हाँ काट ली। तो भी आप कुछ नहीं कर सकते। कुछ कर सकने की हैसियत वाले यहाँ से पहले ही लौट चुके हैं। जो यहाँ बचे हैं, उनकी कोई क़ीमत नहीं है। वो तो बस ऊँट-ऊँटनी हैं।

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