जनवरी 17, 2016

नया पता: ख़त मेरे

http://khat-mere.blogspot.in/2016/01/pre-post-of-this-blog.htmlलिखना छोड़ा नहीं है। नया घर सजाया है। मन तो नहीं था पर क्या करूँ, यहाँ भी बता रहा हूँ। एकएक कर बताने से अच्छा तरीका यही लगा। आप सबको नया पता बताता चलूँ। जो लोग मेरे यहाँ से जाने के बाद से नाराज़ हैं, उनका हमारा साथ और आगे तक जाये, यही मन में दिल में दिमाग में है।

करनी चापरकरन की कहानी यहीं तक। आगे अगले पन्ने तरतीब बेतरतीब सब के लिए नए पन्ने। पता नहीं कितना यहाँ छोड़ पाया, कितना यहाँ से ले जा रहा हूँ। वक़्त लगता है। पर आप साथ रहेंगे, तो हो जाएगा। नहीं भी ले जा सका, तब भी यह निशान वक़्त के साथ और गहरे होते जाएँगे।

सागर, पूजा तुम दोनों पहले मेहमान हो। आना ज़रूर। संदीप, अब सबको बता दिया।

राकेश, आलोक, लवकेश, संगीता और आप.. सब आना। और जिनके नाम नहीं ले रहा हूँ, वह भी साथ चले आइए। ख़त पर छोड़ा था, ख़त से ही शुरू कर रहे हैं।

नया पता है: ख़त मेरे http://khat-mere.blogspot.in

दिसंबर 29, 2015

अलविदा पोस्ट: ख़त आख़िरी

तो साहिबान हम चलते हैं। फ़िर कब मिलेंगे, पता नहीं। मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी  वाला निदा फ़ाजली का शेर याद आ रहा है। उसे लिख भी दूँ, तब भी नहीं मिलेंगे। क्या करूँ? मन भी तो खाली होना चाहता है। इस जगह ने सारी खाली जगहें अपने नाम से रख ली हैं। कोई और बात आए भी तो कैसे आए? इसलिए जा रहा हूँ। सोते जागते हर पल जिसकी ख़ुमारी रहे, उससे निकल जाने की तमन्ना अब और नहीं रूक सकती। रुकते-रुकते यह बीतता साल और जुड़ गया। कहा था न कभी, जाते-जाते वक़्त लगता है। वक़्त लगता है पिघलने में बिलकुल जैसे। जैसे वक़्त लगता है, किसी याद के एहसास को अंदर घुलने में। जैसे बादलों में घुलता है सूरज। जैसे पानी में घुलता है नील।

इन पाँच सालों में मुझसे कोई और काम नहीं हुआ। फुल टाइमर रहा। बस एक ही धुन सिर पर सवार। कुछ लिखना है। भाग भागकर वापस आता और कई बार अनदेखी, अनकही बातों को कहने से भर जाता। लिखने को तो इस एक पंक्ति में वह बीतते पल कभी समा नहीं सकते। पर शायद यही इसकी सबसे कमज़ोर कड़ी है। कहते हुए भी न कह पाना। कभी-कभी होता है, हम रुक जाना चाहते हैं पर रुक नहीं पाते। इन घड़ियों में अभी भी मेरा मन इतनी तेज़ी से भाग रहा है। के इस तरह अचानक लगने वाले निर्णय इतना अकस्मात नहीं है। इसे अप्रत्याशित तो बिलकुल भी नहीं कहा जाना चाहिए। पिछले साल इसी दिन से  इस साल, इसी दिन तक। वापस।

यह ठहराव दिमाग को ‘रिस्टार्ट’ करने के लिए बेहद ज़रूरी कदम है। उन्हीं स्थापनाओं, विचार प्रक्रियाओं में फँसे रहना इकहरेपन से भर जाना है। चीजों को देखने, समझने, इस दुनिया में दखल करने की भाषा के और रूप भी होंगे जो इस तरह के खाँचों में नहीं आ पा रहे होंगे। उन सबके लिए ज़रूरी है, ठहरना। यह सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बनी बनाई संरचना से बाहर निकलने, ख़ुद को बचाए रखने की छोटी-सी कोशिश भर है। किसने कहा नहीं लिखुंगा। कागज़ पर लिखुंगा। पर यहाँ जितना वक़्त दे सकता था, उसकी किश्तों को वापस समेट लेने की प्रक्रिया को शुरू का देना है। कोई माने-न-माने इतना वक़्त लगाकर इतनी मेहनत के साथ इस जगह को बनाने की जो अनुभूति, जो एहसास मेरे रोएँ-रोएँ में भरे रह गए हैं उन्हें कभी अपने से बाहर नहीं करना चाहता। लिखना बाहर ले आना है। इस तरह अब जबकि रुक जाऊँगा, तब तरतीब से देख पाने के खालीपन से भरा रहकर यह देखने की कोशिश करूँगा, अभी भी क्या है, जो मेरे अंदर रह गया है। कोई बात, कोई पल, कोई अनछुआ एहसास, किसी दिन की ढलती शाम, ढलती शाम से आसमान में उतरता चाँद।

क्या है, जो इसकी परिधि में कभी नहीं समा सका। शर्तिया उस भाव को कहने की ठोस भाषा मेरे पास नहीं होगी। मेरी कमज़ोर-सी लड़खड़ाती बारहखड़ी में इतना दम कहाँ कि कुछ कह पाऊँ। जो सब कहा, वह उन सबको कहने की कोशिश है। कहा अभी भी नहीं है। ऐसा कहकर कुछ संभावनाओं को अपने अंदर बचा ले जा रहा हूँ। जरूरी है सपनों की तरह किसी उम्मीद का बचे रहना। वह बची रहेगी तो हम बचे रहेंगे। तब किसी तारों भरी शाम, उनके रेशों से हम अपने हिस्से का आसमान बुनने निकलेंगे। पर कहा न। अब इस ठिकाने पर इतना ही। कोई माने-न-माने पर यह ऐसी जिल्दसाज़ की दुकान हो गयी है, जिसमें जिसमें किताब चाहे कोई भी आए, उसकी सीवने उधेड़कर तानाबाना वैसा रह जाता जैसा पिछली रात सिराहने रखकर सोया था। कुछ वक़्त चाह रहा हूँ अपने आप से। इस कमरे से निकलकर बची रह गयी दुनिया को पास से देखने का हुनर सीखने। इसके लिए वक़्त चाहिए। जो सारा है, वह तो यही ले जाता है। इसलिए जा रहा हूँ। जाना हमेशा लौट आने के लिए नहीं होता। कभी सिर्फ़ लौट जाने के लिए होता है। इसलिए लौट रहा हूँ। वापस। कभी न लौटने के लिए।

(28.12.2015 सुबह करीब सवा नौ बजे।)

2.
लिखना ज़रूरी क्यों हैं? यह ऐसा सवाल रहा जो हमेशा से चारों तरफ़ से घेरे रहता। लिखता भी जाता और कहता भी जाता, यह लिखना बेकार है। क्यों हम बेकार का काम किए जा रहे हैं। इसके बाहर निकलने के लिए ज़रूरी है, अब निकल जाना। निकलकर दूर से इस दस्तावेज़ को देखना। इसके टुकड़े-टुकड़े करके समझना है कि इसकी समझ क्या है? हमें भी तो ऐसा करने के लिए दूर से देखने के मौके मिलने चाहिए। इसलिए भी अब इस पानी की परछाईं से थोड़ा बचना है। भीगने से बचना, गुम होते जाते क्षणों को दोबारा रचने का अवकाश भी लेकर आएगा, इस उम्मीद के साथ यहाँ से जाते हुए एकबार बस एक नज़र दौड़ा रहे हैं। जैसे गाँव से लौटते वक़्त हम भागकर छत पर ज़रूर जाते। देखते, जो छूट रहा है, उसे तस्वीर के साथ अपने अंदर भरकर साथ ले जा सकें तो जेब में भरकर रख लेंगे। ताकि दोबारा आयें तो झट से जान जाएँ कहाँ-कहाँ क्या बदला? कितने हिस्सों पर पैबंद है? कितने सिरे पर आसमान के रफ़ू नए हैं?

नए की तलाश कौन नहीं करता? लेकिन इसे इस तरह कहना सबसे ज़रूरी है। इस कोशिश में जो सबसे ज़रूरी बात है, वह है, कहना। इतनी आपाधापी में एक पल के लिए भी इससे हट नहीं पाया। लिखना गालिब के ‘इश्क़’ और ‘काम’ के बीच झूलता रहा। इसने उस ‘सेफ़्टी वॉल्व’ की तरह काम किया, जो मेरे अंदर की बातों को चोर दरवाज़े से बाहर निकालता रहा। यह कभी भी दिमाग से उतरने न पाया। हरदम लगता रहा लिख नहीं रहा। पर इन लमहों को लिख लेना चाहिए। यह मेरी अपनी आवाज़ को सुने जाने लायक भाषा में तब्दील कर कह देने की अनदेखी कोशिश थी। इसने मेरे मन मेरी सारी अनुभूतियों को ठोस रूप में परिवर्तित कर दिया। ठोस होना ‘स्थूल’ होना नहीं है। स्थूल होना भोथरा हो जाना है। ठोस होना, छूने लायक बनाने की जद्दोजहद में जूझते रहना बनता गया। यहाँ जितनी भी बातों को कह पाया वह सब की सब इसी तरह की रही होंगी। ठोस, स्थूल, भोथरी। जो कहते हुए भी नहीं दिख रही, वह जब मिल जाएंगे, तब कहूँगा।

लेकिन सवाल है, क्या अब वह सवाल, सवाल नहीं रहे? इनके आज भी उसी रूप में होने के बावजूद क्या है, जो बदल गया है? कुछ तो होगा जो अंदर दरक रहा है। यह खिसकाना उन स्थापनाओं से आगे बढ़ जाना है या उनमें किसी तरह का संशोधन है। जितना इस लिखने के सैद्धांतिक आधारों को इधर पीछे कुछ जादा ही सघनता से सोच रहा हूँ, वहाँ देखने लायक बात है, इस तरह चलने की बात का ख़याल कैसे आया होगा? यह शायद शुरू से ही एक गरम हवा का गुब्बारा रहा होगा जो अपनी अधिकतम ऊंचाई पर जहाँ तक पहुँच सकता था, पहुँच चुका होगा। उसे किसी मानक में रूपांतरित नहीं किया पर फ़िर भी महसूस तो हो जाता है। हम एक ख़ास जगह पहुँचकर वापस नीचे देखते हैं। तब गलियाँ रेखाओं में और नदियां सड़कों में बदल जाती हैं। पहाड़ों पर चले जाना दृष्टिभ्रम का निर्माण करता है। ऊँचाई पर रहने की आदत हम मैदान वालों की नहीं रही। हम कुछ दिन जाते हैं, ऊपर से दुनिया देख भालकर वापस लौट आते हैं।

इस तरह लौट आने पर हम जान पाते हैं, वह क्या था(?) जो ऊँचाई से दिख रहा था, पर मैदान पर आते ही उसी दिख रही जगह में गुम हो गया। ‘गुम हो जाना’ हमारा शब्द है। उसे शहर, मैदान, जमीन किस तरह से कहेंगे, मुझे नहीं पता। जैसे ही मैं खो जाता हूँ, लगने लगता है बात जो शुरू की थी, वह भी पीछे छूटती जा रही है। इसलिए सही वक़्त यही है, रुक जाऊँ। रुकना फ़िर से अंदर देखने का मौका लाएगा। इसी उम्मीद से ख़ुद को समझने की कोशिश पर वापस लौटते हुए, लौट रहा हूँ। अलविदा। फ़िर पता नहीं कब मिलेंगे। मिलेंगे भी या नहीं मिलेंगे। पता नहीं। अभी बस जाना है। जा रहा हूँ।

(दोपहर: बारह पचास, तारीख़ वही। आज अट्ठाईस दिसंबर)

3.
मेरे पास जो वक़्त था, जो वक़्त नहीं था, उसे इकट्ठा करके इसे एक मुकम्मल जगह बनाने की हर कोशिश यहाँ दिख जाएगी। जो नहीं दिख रही, उसे मेरी और सिर्फ मेरी कमजोरी माना जाये। जितना देख देखकर पूछ पूछकर जानता-समझता गया, उसे अपने यहाँ शामिल करता गया। उन्हें इस जगह लाने की जद्दोजहद में डूबता, उतरता जितनी भी हैसियत रही, उतना कर पाने की इच्छाओं से ख़ुद को भर लिया। अभी भी भरा हूँ पर अब उस तरह की आग नहीं है। उत्प्रेरक जो रहे होंगे, वह अब काव्य हेतु, काव्य प्रयोजन जैसी जटिल संरचना वाले जटिल सवालों में तब्दील होते गए होंगे। सवालों का होना हरबार जवाबों की तरफ़ ले जाये, ऐसा होता नहीं है।

फ़िर यहाँ एक बात जो हमेशा अंदर चुभती रही, वह यह के यहाँ कभी हमारे परिवार की झलक नहीं दिखी तो यह मेरी सीमा है। ख़ुद को इतना अकेला कर लेने की हद तक चला गया कि हर बार जब कोई नया साथी मिलता, उसे लगता इस शहर में उसी कि तरह अकेला रहता हूँ। पर हुज़ूर, यहाँ लिखी हर एक बात के लिए जितने वक़्त की किश्त मुझे घर की चारदीवारी के बीच मिलती रही, वह मोहलत सिर्फ़ उनकी कीमत पर है। उसे कभी किसी तरह किसी भी रूप में तब्दील करके आँका नहीं जा सकता। घर न होता, तब चिंता होती। चिंता होती तो लिखना न होता। मेरे जिम्मे सिर्फ़ सुबह का दूध और शाम के वक़्त पानी भरने की ज़िम्मेदारी रही। बीच के दिन में घर कैसे बनता, बिगड़ता, बुनता, उधड़ता रहा इसकी ख़बर पास जाने पर मिलती। कभी बाज़ार या बाहर जाने की बात हो आती, तब अनमना होकर छटपटाता रहता। किसी तरह भाग भूग कर उसे निपटाते हुए ख़ुद को कोसता रहता। सोचता कि काश इससे बच जाता।

माता-पिता, भाई-बहन और डेढ़ साल से तुम। यह सब मेरे लिखे होने में इस कदर छिप जाएँगे, इसे लिखना भी पता नहीं कितनी अजीब बात है। इसे इस तरह कहने और स्वीकार करने में इतना वक़्त लग जाएगा कि आख़िरी पोस्ट पर आ जाऊँगा, कभी सोचा न था। जिसे अपना कमरा कहता रहा, उसके अंदर के एकांत को बनाए रखने में मुझसे इन सबकी हिस्सेदारी है। यह सिर्फ़ एक घर की बात नहीं है, उन सबकी बात है जो गाहे बगाहे यहाँ होते हुए भी सीधे उतरते हुए नहीं दिख पाये। यह शहर की संरचना या उसकी गतिकी को समझने का शास्त्र भले बना रहे हों पर उनकी स्थापनाओं को बिन पढ़े, मैं ख़ारिज कर रहा हूँ। क्योंकि जिस तरह हम इतनी पास से सब चीजों को देखते हुए उन्हें दर्ज़ करते रहे, उसकी तह में पहुँच कर थाह लेना उस किसी एक विषय के अनुशासन के बस की बात नहीं। वह सब किताबें हैं और हम किताबों से बाहर हैं। कौन देख रहा हैं हमें? कोई नहीं। इस तरह हम कभी किसी की नज़र में नहीं आने वाले।

यह लैपटॉप, जिसपर अभी कागज से देख देखकर टाइप करूँगा। अगर यह न आया होता, तब इस जगह का इस तरह से बन पाना कतई ऐसा न होता। न जाने कितने फ़ोल्डरों में वर्ड फ़ाइलें मनसदों की तरह पड़ी हुई हैं। आधी अधूरी बातों से अटी पड़ी उनकी कहानियाँ कभी नहीं कह पाया। इधर तो जैसे कहने के लिए सब अपने अंदर बाहर इस कदर परेशान रहे कि कितनी कहानियाँ कितने किस्से तो वहीं किसी ‘रफ़ ड्राफ़्ट’ की तरह कहीं पड़े होंगे। ऐसे कितने अनकहे हिस्से कई कई बार बिन देखे सीधे सीधे डिलीट हो गए होंगे। इनकी ऐतिहासिकता का ज़रा भी अंदाज़ा किसी को कभी भी नहीं लग पाएगा। और वह सारी बिखरी पड़ी तस्वीरें जिन्हें ढूँढ़ते-ढूँढ़ते लोग पता नहीं क्या कर जाते, मैंने उन्हें सहेजने, यहाँ लगाने से पहले लिखने से भी जादा वक़्त लगाकर कुछ भी गलत नहीं किया। वैसे ‘गलत’ यहाँ गलत शब्द है। पर इतने भावतिरेक में समझ नहीं पा रहा कि चीज़ें जैसे अंदर चल रही हैं, वह किस तरह कैसे भी करके हूबहू कागज़ पर उतरती चली जाएँ। लेकिन कितनी हद तक वह वैसे आ पा रही हैं, कह नहीं सकता। यह बिलकुल तय बात है कितनी ही बातें अधूरी रहकर छूट गयी होंगी। कितनी बातें कहकर भी कुछ नहीं कह पायी होंगी। कितनी बार न चाहते हुए भी लिखने को मज़बूर करते हुए जो सोचा, अब उसे कहने जा रहा हूँ।

इस अधूरेपन में जो बचे रहने की ख़्वाहिश है, उसे कोई नहीं देख रहा। मैंने देख लिया है इसलिए इस लिखने वाले अपने पहले इश्क़ को अधूरा छोड़कर जा रहा हूँ। इस जगह को छोड़ना कितना मुश्किल है, यह मेरे सिवा कोई और नहीं जान सकता। अभी तो कितनी ही दोस्तियाँ बनती, कितनी हज़ार बातें होती। हम ख़ुद किसी बात का किस्सा होकर कहीं रह जाते। पर सब संभावनाओं को टटोले बिना जा रहा हूँ। ऐसा कहते हुए भी दिल में अंदर से कुछ चिटककर टूट जाने जैसा कुछ है। टूटना सिर्फ़ इस संरचना का नहीं उसके जरिये मेरे अंदर घर कर गयी प्रक्रियाओं, ढाँचों, संघटनों, विघटनों से विलगाव भी है। अब सबको छोड़ कर चले जाना है। मन भाग रहा था, जब उन्होंने बाहर बुला लिया। बात कहीं अधूरी ही रह गयी। चलो कोई नहीं। अब चलते हैं। अलविदा। शब्बा ख़ैर।

वैसे यहाँ तक आते-आते मन उदास हो गया हो, तब आपके लिए नुसरत फतेह अली ख़ान की क़व्वालियाँ कुछ कर सकती हैं। पिछले कुछ दिनों से लगातार उन्हें दिन-रात, सुबह-शाम सुन रहा हूँ। सुकून ढूँढ़ने से मिलता है। लिंक है, साउण्ड क्लाउड का। लाहौर से। मेरा फ़ेवरेट ट्रैक, है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम

(साल वही, 2015। दिन वही, अट्ठाईस दिसंबर। वक़्त दोपहर के सवा एक बजे के लगभग।)

दिसंबर 27, 2015

अलविदा से कुछ पहले..

कल पूरी रात करवट-करवट नींद में सवाल थे और नींद गायब थी। मन में दोहराता रहा, अब बस। अब और नहीं लिखा जाता। कोई कितना कह सकता है। सच, इन पाँच सालों में जितना भी कहा है, मेरी दुनिया को समझने की मुकम्मल नज़र दिख जाती है। मेरे पास बस इतना ही है, मुझे अब यह समझ लेना चाहिए। यहाँ मैं वही पिछले साल की बातें नहीं दोहराना चाहता। दोहराते हुए कोई कितना असहाय लगता है। मैं भी ऐसा होता गया हूँ। आलोक से कहा तो कहने लगा, मत जाओ। ऐसे बहुत हैं, जो यही बात अलग अलग तरह से कह रहे हैं। अभी जब देवेश से कहा। वह भी यही कहने लगा। पर इस बार यह भावुक निर्णय नहीं है। न अचानक इस तरफ़ पहुँच गया हूँ। कुछ फुरसत मुझे भी चाहिए। थी तब भी नहीं, पर तब से लेकर कुछ तो है जो बदला होगा मेरे अंदर।

यह कहते हुए भी कितना अजीब लग रहा है, यह ब्लॉग, करनी चापरकरन अब बंद होने जा रहा है। हमेशा के लिए। इस पर दोबारा आने का मन हुआ तो भी नहीं आएंगे। उसी के लिए तो इतनी चिट्ठियाँ यहाँ टाँगे जा रहे हैं कि उनसे कोई एक साथ गुज़र नहीं सकता। लेकिन जाने से पहले कुछ जवाबों को देना और उन्हे जवाबों की तरह न कहना ज़रूरी है। इसलिए एक दो-पोस्ट इधर-उधर सब चलता है। पर साल ख़त्म होने से पहले इसे रोक देंगे। जब शुरू एक दिन हुए, तब एक दिन ख़त्म भी होंगे। ज़रूरी है एक दिन रुक जाना। थोड़ा बैठ कर पीछे देखना। ठहर कर देखना कहाँ से चले थे, कहाँ पहुँच गए।

2.
सबसे पहली बात तो यह कि ऐसा पता नहीं क्यों हुआ होगा कि मेरा लिखा इतना अमूर्त होता गया जिसमें कोई स्टैंड नहीं दिख रहा। शायद यह देखने वाले की नज़र का फ़ेर है, जो इनके पीछे उभरने वाली छवियों को देख पाने में असमर्थ हैं। उसका कहना है, जो कोई पक्ष नहीं लेते इतिहास और वक़्त उन्हें एक ख़ास खाँचे में बंद कर देता है। वह वही साँचा है, जिससे मेरी लड़ाई है। मुझे नहीं लगता उसने कहने से पहले जादा सोचा होगा। पर आज मैं ऐसी बात क्यों करने लगा। मुझे किसी से कोई प्रामाणिकता नहीं चाहिए। जैसा मैं हूँ, वैसा मुझे पता है। जो यहाँ आते रहे हैं, उन्हें भी थोड़ा बहुत अंदाज़ा होगा।

चलो छोड़ा। कुछ तात्कालिक दबाव भी होते होंगे, जो हमारे लिखने को इस तरह तोड़ते-मरोड़ते रहे होंगे। एक बार की बात है, हिन्दी ब्लॉग के दस साल हो जाने वाली मेरी पोस्ट पर लंदन से अनुराग शर्मा कुछ-कुछ नाराज़ हो गए। मैंने कुछ कह दिया था। उस शुरुवाती दौर में सब प्रवासी थे और वे सब इस ख़ास तकनीक तक पहुँचने में सक्षम रहे। उनके मनों में हिन्दी अपने दिलों में देश की सुगंध जैसी महक रही थी। वहीं मैंने उनकी टिप्पणी पर तल्ख़ होते हुए फ़िर जवाब दिया था शायद। पता नहीं उनका गुस्सा अब भी उतरा है या नहीं। तबसे उनसे बात नहीं हुई है। ऐसे ही एक समीर लाल की उड़नतश्तरी थी। जहाँ तक मैंने कभी पहुँचने की कोशिश नहीं की। काकेश की कतरन, लपुझन्ना, तानाबाना, अखाड़े का उदास मुगदर, मोहल्ला पता नहीं कितने और नाम मन में इधर उधर हुए जा रहे हैं। पता नहीं हिन्दी ब्लॉग अपने पाँच साल में ही कहाँ खो गया। यह वही वक़्त था, जब मैंने अपने लिए पाँच साल माँगे और यहाँ आ गया।

3.
वैसे यह बिलकुल वैसा ही था जैसे हम ढलते हुए सूरज को देखते रहें। पर महसूस इन गुजरते सालों में बहुत बाद में करते हुए ख़ुद डूब जाएँ। एक एक कर सब जाने लगे। सतीश पंचम का सफ़ेदघर मुझे अपने गाँव जैसा लगता। मैं भी सोचता कभी ऐसा हम भी लिखा करेंगे। पता नहीं यहाँ कभी ऐसा कर भी पाया के नहीं। मसिजीवी एक कल्ट ब्लॉग था। पर विजेन्द्र की लद्दाख वाली पोस्ट में उनका लगाया पिकासा का एलबम कहीं यादों में टंका रह गया। वह उतरा ही नहीं। उदय प्रकाश भी ख़ूब लिखा करते। यह हमारे पढ़ पढ़कर सीखने के दिन रहे। उन्हीं दिनों अपने मन में मैंने सागर से शर्त लगाई। तुम्हारी तरह हम भी लिखकर रहेंगे। अब जबकि वह भी यहाँ से गायब हैं, यहाँ रुके रहने का मन नहीं होता। एक पूजा बची। जो बैंगलोर में भी दिल्ली, देवघर, पटने की याद को लेकर बैठी हुई है। तुम्हारी किताब बढ़िया है पूजा संदीप तुम्हारा नाम कई बार लेता है। अच्छालिखती हो तुम।प्रमोद सिंह अब चुप हैं। रवि रतलामी से हम तब मिले, जब वे रतलामी में से श्रीवास्तव हो गए और उन्होंने लिखने के लिए आदम हौवे की ओट ले ली। उन्होंने ओट क्या ली, लिखना ही छोड़ दिया।

अनूप शुक्ल जी का फ़ुरसतिया इसके तो कहने ही क्या। कानपुर से अब उसी जबलपुर की सरकारी फैक्ट्री में हैं, जहाँ किसी दौर में ओमप्रकाश वाल्मीकि रहे थे। ज्ञानरंजन से लेकर पता नहीं किन-किन से मिलते रहे। अब जबकि अनूप जी की पुलहिया किताब आ चुकी है, उन्हें ऐसी और किताबों के लिए अग्रिम शुभकामनायें देते हुए लौट जाने को हूँ। इसी साल जनवरी में कानपुर जाने से पहले बात हुई थी। उसपर पोस्ट ड्राफ़्ट में पड़ी रह गयी। पूरब का कलकत्ता है कानपुर

ऐसे ही इसी सालसागर का एक शनिवार दफ़्तर से निकलते हुए फ़ोन आया। पहले तो नंबर नया था इसलिए पहचान नहीं पाया, फ़िर उसकी ब्लॉग पर लगाई  राजेन्द्र यादव की किताब 'मुड़-मुड़ के देखता हूँ' की ऑडिओ क्लिप से तुरंत मिलान कर आवाज़ पहचान गया। सागर ही थे। पता नहीं ऑफिस शायद निज़ामुद्दीन ईस्ट या वेस्ट में था। और रहते शायद भोगल में हैं। अपनी रानीजान के साथ। कितना कहा, पर तुम माने नहीं। लिखने के लिए साथ की ज़रूरत होती है। तुम नहीं लौटे इसलिए अब मैं ही लौट रहा हूँ। जैसे चार साल पहले आलोक और मैंने एक साथ फ़ेसबुक के लिए लिखना कम कर दिया था और हम यहाँ आ गए थे। अब मैं यहाँ से जा रहा हूँ। बस कुछ यादें बेतरतीब आए जा रही हैं, उन्हें कहने का मन है। और कुछ नहीं।

4.
यह ब्लॉग भी अजीब जगह है। हर वक़्त दिल पर हावी। मन कहीं लगता ही नहीं हो जैसे। कहते हैं, ऐसी हालत में कहीं आते-जाते नहीं। पर मैंने सोच लिया है, यहाँ से अब चलने का वक़्त आ गया है। सही वक़्त पर न करो तो काम रह जाते हैं। समझ तो हम बहुत पहले गए थे, पर थोड़े जिद्दी थे। लेकिन लगता है, अब ज़िद काम नहीं कर रही। उसने साथ छोड़ दिया है। अधूरी बातों की तरह इसे भी यही छोड़ देंगे। जैसे कल रात एक और पोस्ट जुड़ गयी और इस तरह कुल जमा रफ़ ड्राफ़्ट हुए सत्तासी। किन्ही में तस्वीरें लगी हैं, कुछ में दस-दस बीस-बीस लाइनें। कई मज़मून ऐसे ही डायरी में पड़े रह गए हैं। उन्हें ऐसे ही रख देंगे। छुएंगे भी नहीं। क्या करेंगे कहकर। बहुत कह लिया। अब चुप रहकर सुनने का वक़्त है। सुनने का भी अपना मज़ा है। हम भी कभी इन दिनों को यादकर कभी कहेंगे, एक दौर वह भी था, जब हम भी यहाँ लिखा करते थे। इसने भी हमें नक्कारखाने में कुछ हैसियत दी थी।

लेकिन यहाँ से जा रहा हूँ, तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरी सारी क्षमताओं को मैंने उसकी अधिकतम सीमाओं तक लेजाकर छोड़ दिया। यहाँ रहता तो होता कुछ और। पर सच में इस नाम की छवियों ने अंदर तक तोड़ कर रख दिया है। और इतना लिखकर यह लग रहा है, बीती उनतीस दिसंबर दो हज़ार चौदह को यही सब बातें आने से रह गयी होंगी, जिसके एवज़ में साल भर और गाड़ी चल गयी। वरना यहाँ से जाने का मन जितना तब था, उससे कुछ कम अभी महसूस कर रहा हूँ पर जाने के कारण ज्यों के त्यों बने हुए हैं। उनका होना मुझे लगातार तोड़ रहा है। जैसे कितनी ही बातों से इसने न जाने कितने ढाँचों, स्थापनाओं, विचारों, भावों, वृत्तियों, इच्छाओं को तोड़ा और उन्हें फ़िर से बुनते हुए सामने रखा। यह नाम अपने अंदर तोड़ने की जितनी क्षमताओं को रखता है और उसका जितना ताप मैं महसूस करता हूँ उसका एक सिरा भी कभी यहाँ नहीं कह पाया। जूझता रहा कहने के नाम पर। छटपटाता रहा। साँसें ऊपर नीचे होती रहीं। पर यह नामाकूल कहीं भी रुकने का नाम नहीं ले रहा। इसलिए इसको तोड़ने का मन हो रहा है। इसको तोड़े बिना मैं ख़ुद को समेट नहीं सकता। हो सकता है, आपको मेरे मन की परतों की कोई थाह नहीं लग रही हो पर यह मेरे लिए किसी भी बनी बनाई संरचनों को तोड़ने वाले साधन के रूप में मिला था।

जिस दौर में यह मिला था, उस वक़्त हवा में भी कुछ इसी तरह की बातें तैर रही थी। लेकिन इतनी साफ़-साफ़ दिखती वजहों के भी अगर आप समझ नहीं पा रहे तब मैं यही कह सकता हूँ कि अब कागज़ पर लिखने का मन है। कागज़। जहाँ से हम शुरू हुए थे। जहाँ हमने लिखना सीखा था। ऐसा नहीं है यहाँ लिखना नहीं सीखा। लेकिन जितना कहा, उससे जादा उसे छिपाना सीखा। उसकी परछाईं से भी तो कभी-न-कभी निकलने की जरूरत होती है। सही वक़्त तभी होता है, जब आप समझ जाएँ। समझ समझ का फ़ेर है। शायद मैं समझ चुका हूँ। इसलिए जा रहा हूँ। जाना ज़रूरी है।

जाते-जाते सबसे ज़रूरी बात यह कि इसे किसी भी तरह से पलायन न समझा जाये। पलायन होता तो ऐसे कहकर नहीं जाता। चुपके से चला जाता। बताता भी नहीं। यह लिखना मेरे उन दिनों का दस्तावेज़ है, जब मैंने ख़ुद अपने आपको समेटकर कछुआ बना लिया था। कछुआ अपने मन से अपने अंगों को बाहर निकालता है। मैं भी सिमटकर एक कमरे में बंद हो गया। इस ब्लॉग ने मेरे अंदर एक खिड़की बनाई। जिससे मैं अपने अंदर झाँक सका। देख सका, वहाँ भी एक दिल धड़कता है। किसी को छूने, उससे बात करने इसके साथ कुछ दूर चलने की इच्छाएँ साँस लेती हैं। दिल अभी भी पुरज़ोर धड़क रहा है। वहाँ अब तुम हो। हमारे अनदेखे सपने हैं। तुम कहती हो मैं इसे नहीं छोड़ पाऊँगा। पर देखो आज मैं जा रहा हूँ। और तुम भी देख लो जो हम चुपके चुपके एक दूसरे के नाम बेनामी ख़त रख छोड़ा करते थे अब उसके लिए भी कोई बहाना नहीं छोड़ रहा। सिकहर पर यह लौटने से पहले की अलविदा है बस।

5.
जैसे जनसत्ता से हमारे छपने के दिन चले गए, अब अंदर से लिखने का मन नहीं हो रहा। लेकर भी तो इतना ही वक़्त लाया था। और सही सही हिसाब लगाऊँ तो वह पहली नौ पोस्ट तो एक बटन दब जाने से ऐसी गायब हुई थी कि आज तक हाथ नहीं लगीं। दिसंबर से दिसंबर। पूरे पाँच साल। अब चलते हैं। समांतर जुलाई एकतीस दो हज़ार पंद्रह को बंद हुआ। दिल टूट कर बिखर गया हो जैसे। पहली बार लगा जैसे हमारा घर कहीं चला गया। अब जहाँ हम छप सकते थे, वही जगह नहीं बची तब यह ब्लॉग बचकर क्या करेगा। आप सबको लग रहा होगा कैसी बचकानी बातें हैं। पर यह सच है। कुल जमा पंद्रह पोस्ट थीं जब हम जनसत्ता में पहली बार छपे थे। प्रभाष जोशी के कागद कारे वाला जनसत्ता। वह जनसत्ता जिसने हममें ताकत भरी। जिसके कारण हम लिखने की ताकत समझ सके। हम बिना किसी की पूंछ पकड़े वहाँ के संपादकीय पृष्ठ पर थे।

हम भी ख़ुद को कुछ समझने लगे थे। लगा था हम भी कह सकते हैं। पर सिर्फ़ जनसत्ता। हमने रवीश कुमार के हिंदुस्तान में छपने वाले कॉलम ‘ब्लॉग वार्ता’ के अवसान काल में लिखना शुरू किया। एक सेलेब्रिटी एंकर पत्रकार जिन जिन के ब्लॉग पर लिखता गया वह सब जैसे छाते रहे। आज अधिकतर ऐसे छाए हैं कि बंद छातों की तरह दरवाज़े के पीछे पड़े धूल खा रहे हैं। समझ में आने लगा यह पवार स्ट्रक्चर का खेल है सारा। वरना मेरे पास भी अनुराग वत्स की तरह नवभारत टाइम्स में नौकरी होती तो मेरा भी कोई सबद जैसा ब्लॉग होता। कुँवर नारायण की गद्द्य की किताब ‘रुख़’ का संपादन मैंने किया होता। गीत चतुर्वेदी की कवितायें मेरे ब्लॉग पर लगतीं। चन्दन पाण्डेय की कहानीरिवाल्वर  पीडीएफ़ में मैं शेयर करता।

मेरा वितान थोड़ा कम होता तब पाखी के अविनाश मिश्र  का उप-सम्पादन मेरी कलम कर रही होती। दिल्ली हिन्दी अकादमी की मैत्रेयी पुष्पा मुझे शायक आलोक और प्रांजल धर की तरह पन्द्रह मिनट के कविता पाठ के लिए दस हज़ार रुपये के मानदेय वाला लिफ़ाफ़ा बढ़ाते हुए शुभकामनाओं से लाद देतीं। वरना ऐसा क्या है, प्रवीण पाण्डेय की बोझिल, इकहरी, उबाऊ कविताओं में कि उनकी हर बर्बाद कविता पर टिप्पणी की बौछार होती रहती है। और हम ऐसा लिखते हैं, जो किसी की समझ में नहीं आता। इतना समझने पर भी समझ नहीं आता मामला क्या है? क्या मामला इतना ही है?

6.
यह क्या हो गया है मुझे? जो बातें आज तक नहीं लिखीं उन्हें आज कहने का कोई मतलब नहीं। पर फ़िर भी कहते हैं, जाते-जाते जो मन में हो, उसे कह देना चाहिए। अच्छा रहता है। मैं किसी तुलनात्मक अध्ययन में नहीं पड़ना चाहता। हो सकता है, यह ऊपर लिखे नाम किन्हीं असली व्यक्तियों के हों। पर इनके नाम भी यहीं हैं, इससे कोई फ़रक नहीं पड़ता। जो तंत्र इस सारी गतिकी को नियंत्रित कर रहा है, उसमें दीमक इस कदर लग चुकी है कि भले उसके दरकने में अभी थोड़ा वक़्त हो पर एक दिन उसे ख़त्म होना ही पड़ेगा। नाम बदल जाएँगे पर तंत्र उन बदले हुए नामों को भी ऐसे ही खड़ा करता रहेगा। ज़रूरी नामों का नहीं, तंत्र के चरित्र के बदलने का है। यह जितनी भी जगहें ऐसे भरी हुई थीं, उनमें सेंध लगती हुई यह जगह अब चुक गयी है। इसलिए इसे बंद होना ही था। बंद होना विचार का मर जाना नहीं है। विचार तो यहाँ अमेरिका के इस गूगल के अन्तरिक्ष में कहीं टिकाये, समुद्र के नीचे बिछी तारों के जरिये किसी अनाम सी मशीन से जुड़े सर्वर में तब तक रहेंगी, जब तब वह चाहेंगे। क्योंकि मेरा ब्लॉग बंद करने का मन है, डिलीट करने का नहीं। जब तंत्र इस कदर दुरभिसंधियों से अटा पड़ा हो वहाँ हम जैसों का कोई काम नहीं। इसलिए हम अपने काम पर लौट रहे हैं। काम ज़रूरी है।

इससे जादा अब कहने का मन नहीं है। पर मुझे पता है, यहाँ से चले जाने के बाद किसी को कोई फरक नहीं पड़ेगा। जब मैं यहाँ था तब कौन सा पहाड़ रोज़ टूट रहा था जो मेरे यहाँ से चले जाने के बाद उसमें भूस्खलन की आवक में तीन गुना की वृद्धि होने जा रही है। जो मन में था, उसे वैसा ही कहने की कोशिश की है। बुरा लगा तब भी मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा। उनकी इतनी हैसियत नहीं कि कुछ भी कर सकें। वैसे सच कहूँ तो पाँच साल बाद इसे बंद करना ही था। अब थोड़ी किताबें पढ़नी हैं, थोड़ा कागज़ पर लिखना है और थोड़े बाकी रह गए काम पूरे करने हैं। वक़्त कहीं से तो निकालना था, निकाल लिया।

दिसंबर 23, 2015

किताबें, धूप, हड़बड़ाहट, अकेलापन और आईनाघर की भूमिका

वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ। किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों कहीं. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं। किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाक के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं किस एहसास को भरे दे रही थी. वहीं अपने मोबाइल को निकालकर उन क्षणों को अपनी आवाज़ के साथ कैद कर लिया. मानो वक़्त कहीं थम सा गया हो. हम जितना भी चाहें, इन क्षणोंको इन्हीं तरहों से कैद कर सकते हैं. कोई और तरकीब हमारे दिमाग में होती, तो वह इनसे कुछ मिलती जुलती ही होती, कह नहीं सकता.

दिसंबर 22, 2015

मेरा पता है कि लापता हूँ मैं..

कभी होता, उसके खर्राटों से वह ख़ुद जग जाता। जग जाता के साथ लेटे सब न जग जाएँ। सबके सोते रहने पर वह उठता। उठकर बैठ जाता। बैठना, थोड़ी रौशनी के साथ होता। रात उस खयाल में ख़ुद को अकेले कर लेने के बाद खुदसे कहीं चले जाने लायक न बचता, तो ख़ूब रोता। आँसू नहीं आते। याद आती। याद आती उसकी हर बात। हर बात पर रुक जाने, लौट जाने से कुछ नहीं होता। रात अँधेरे में उसे कुछ नहीं दिखता। दिखना सिर्फ़ अँधेरे में नहीं होता। उजाले में भी नहीं होता कभी।

तब कुछ सोचकर पहले उसने कहा। फ़िर उसने लिख दिया। एक दिन शब्द बचे रहेंगे। स्याही सूख जाएगी। कागज़ सुर्ख़ गुलाबी होंठों की रंगत से कहीं आगे बढ़कर पीले उदास होकर रह जाएँगे। रंगत सिर्फ़ चेहरों से नहीं उड़ती, उसके साथ उड़ती है खून में बह रही गर्मी। ठंडे खून में मौसम की ठंडक होगी। रंग होंगे पर रंगत न होगी। एक दिन उसे एहसास होगा, वह कितना गैर ज़रूरी था। यह बिन जताए इस दुनिया से चले जाने की सबसे पहली तय्यारी रही होगी। जब उसने मन में ऐसे ख़याल भर लिए होंगे, वह थोड़ा प्यास से भर आया होगा। उठा होगा। थोड़ा रज़ाई से सिर निकालकर पानी को खाली बोतल देखते हुए वापस अंदर दुबुक गया होगा। नाख़ुन कई दिन हुए नहीं काटे। नेलकटर कहाँ गया। अभी तो यहीं था। परसो। इंडियन एक्सप्रेस के नीचे। छिपा हुआ। यहीं होगा। उसने ढूँढ़कर देखा। नहीं दिखा। नहीं दिखा उसे कुछ भी।

उसने ख़ुद को गायब करने के बाद अपनी दीवार पर लिखा, 'पता लगाए कोई क्या, मेरे पते का पता..'। तब से वह गायब है, इस दुनिया से..!! सवाल है, कोई ढूँढ़ रहा है उसे? शायद थोड़ी उसकी परछाईं, वो दरवाज़े के बाहर बालकनी में खड़ी लड़की। उसकी अनकही बातें। थोड़ी खिड़की की सिटकनी। थोड़ी खिड़की ख़ुद।
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