दिसंबर 23, 2015

किताबें, धूप, हड़बड़ाहट, अकेलापन और आईनाघर की भूमिका

वह एक खाली-सी ढलती दोपहर थी। दिमाग बेचैन होने से बिलकुल बचा हुआ। किताबें लगीं जैसे बिखरी हुई हों कहीं. कोई उन्हें छूने वाला नहीं था. कभी ऐसा भी होता, हम अकेले रह जाते हैं। किताबों के साथ कैसा अकेलापन. उनकी सीलन भरी गंध मेरी नाक के दोनों छेदों से गुज़रती हुई पता नहीं किस एहसास को भरे दे रही थी. वहीं अपने मोबाइल को निकालकर उन क्षणों को अपनी आवाज़ के साथ कैद कर लिया. मानो वक़्त कहीं थम सा गया हो. हम जितना भी चाहें, इन क्षणोंको इन्हीं तरहों से कैद कर सकते हैं. कोई और तरकीब हमारे दिमाग में होती, तो वह इनसे कुछ मिलती जुलती ही होती, कह नहीं सकता.

1 टिप्पणी:

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